" राम "- एक नाम जो मन को थाम लेता है |
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"राम"- चेतना,मस्तिष्क और जीवन प्रक्रिया के स्तर पर |
दोस्तों, जब कोई व्यक्ति अत्यधिक दुख में होता है,डर में होता है, मृत्यु के निकट होता है या जीवन से थक चुका होता है तो अनायास ही उसके मुख से निकलता है -" राम "! क्या यह मनुष्य की कोई सीखी या सिखाई हुई प्रतिक्रिया है ? नहीं, यह मन की सबसे गहरी स्मृति से उठी हुई आवाज होती है |
अब सवाल यह है कि आखिर "राम " नाम में ऐसा क्या है जो सदियों से हर उम्र, हर वर्ग, हर परिस्थिति में मनुष्य का सहारा बना हुआ है ? क्या यह सिर्फ आस्था है या इसके पीछे कोई गहरा मनोवैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल रहस्य छुपा हुआ है ?
दोस्तों, इस लेख में हम "राम " को धर्म से परे चेतना,मस्तिष्क और जीवन प्रक्रिया के स्तर पर समझने का प्रयास करेंगे l
💧राम - केवल शब्द नहीं,अनुभव है |
"राम " शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के "रम" धातु और " घम " प्रत्यय के योग से हुई है | "रम" का अर्थ है - जिसमे मन रम जाये अर्थात आनंद देना l "घम " का अर्थ है - ब्रह्मांड का खाली भाग | इस प्रकार "राम "अर्थात सकल ब्रह्मांड में रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म | "राम " वह अवस्था है जहां मन को संघर्ष नहीं करना पड़ता है |
यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि मन का मूल स्वभाव है - भटकना,तुलना करना, डरना और अतीत -भविष्य में भागना | लेकिन राम शब्द आते ही मन रुक जाता है - यह रुकना ही अध्यात्म कहलाता है | न्यूरो साइंस में इसे calm state कहा जाता है - पूर्ण जागरूकता एवं शांति |
💧"राम"- ऐतिहासिक व्यक्ति या चेतना का प्रतीक ?
दोस्तों, अक्सर राम की ऐतिहासिकता को लेकर बहस होती है कि - राम ऐतिहासिक थे या नहीं ? लेकिन यह प्रश्न अधूरा है, क्योंकि सही सवाल यह होना चाहिए कि - राम सिर्फ एक व्यक्ति थे या चेतना की अवस्था ?
" राम " अगर सिर्फ एक व्यक्ति या एक राजा होते तो उनका नाम आज भी दुख में,दर्द में, डर में, मृत्यु में, ध्यान में स्वतः ही हमारे मन की गहराइयों से क्यों निकलता है ?
सच तो यह है कि राम वह चेतना है जो मर्यादा युक्त है - शक्ति के साथ संयम, ज्ञान के साथ विनम्रता, अधिकार के होते हुए त्याग l इसलिए तो राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है l राम कोई कहानी नहीं है, यह समाज के मानसिक अनुशासन का सर्वोच्च रोल मॉडल है l
न्यूरोसाइंस के अनुसार मस्तिष्क शब्दों पर प्रतिक्रिया नहीं करता है, वह भाव, लय और सुरक्षा संकेतों से प्रभावित होता है | "राम" शब्द में यह तीनों सम्मिलित हैं |
"रा " शब्द -
जब हम "रा " बोलते हैं तो यह ध्वनि छाती से निकलती है, हृदय के पास कंपन करती है और सांस धीरे से बाहर जाती है , जिससे हमारी वेगस नर्व ( vagus nerve ) एक्टिवेट हो जाती है |
यह नर्व तय करती है कि हमारा शरीर खतरे में है या सुरक्षित है अर्थात यह हमारे शरीर का सेफ्टी स्विच है | "रा " शब्द इस नर्व को स्थिति के सुरक्षित होने का संकेत देता है |
वेगस नर्व के सक्रिय होते ही पैरासिंपैथेटिक सिस्टम ऑन ( parasympathetic system on ) हो जाता है | उक्त दोनों सक्रिय सिस्टम ही शरीर में तनाव को कम करतें हैं, डर घटाते हैं और शरीर को सुरक्षित महसूस कराते हैं | अर्थात " रा "बोलते ही शरीर को संकेत मिलता है सब ठीक है |
जैसे - जब कोई बच्चा रो रहा होता है तो - माँ कहती है - रा.. रा..रा या कोई लोरी गुनगुनाती है - बच्चा शांत हो जाता है, क्योंकि उसकी बेगस नर्व सक्रिय हो जाती है |
" म," शब्द --
" म " बोलते समय होंठ बंद होते हैं, कंपन सिर के अंदर जाता है, प्री -फ्रंटल कार्टक्स शांत होता है | यही वह हिस्सा है जहां ओवरथिंकिंग, ईगो,एंजायटी जन्म लेते हैं |
" म " उच्चारण दिमाग को पॉज कर देता है | इस प्रकार "राम " नाम का उच्चारण दिल और दिमाग में संतुलन पैदा करके मन को बिना प्रयास ही शांत कर देता है |
“रामचरितमानस" में तुलसीदास जी ने अनेक स्थानों पर यह भाव प्रकट किया है कि राम नाम का स्मरण मन को भय और अशांति से मुक्त करता है -
राम नाम मन दीप धरु, जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौ चाहसि उजियार॥
कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहि पारा॥
💧"राम" नाम जप कैसे काम करता है -
आधुनिक चिकित्सा पद्धति में दवाइयां लक्षणों को दबाती है जबकि "राम" नाम मंत्र मस्तिष्क की वायरिंग को बदलता है | जब कोई व्यक्ति नियमित राम नाम जप करता है तो अल्फा वेब्स बढ़ती है, बीटा वेब्स घटती है, डर केंद्र ( Amygdala ) शांत होता है | राम नाम जप किए जाने से मस्तिष्क की डिफॉल्ट सेटिंग बदल जाती है और मस्तिष्क का नया calm baseline बनता है l
" राम" नाम ट्रॉमा हीलिंग में भी कार्य करता है | आधुनिक मनोविज्ञान का मानना है कि "ट्रॉमा " तर्क से नहीं सुरक्षा के अनुभव से ठीक होता है | क्योंकि "राम" नाम अगनित पीढ़ियों से जुड़ा है ,सामूहिक स्मृति में दर्ज है, अवचेतन में सुरक्षा का प्रतीक है | इसलिए तो संकट में व्यक्ति के मुख से - "हे राम " बरबस ही निकल जाता है | यह कोई धार्मिक क्रिया नहीं है अपितु यह मस्तिष्क की स्वयं को शांत करने की प्रक्रिया है |
💧मृत्यु के समय - "राम नाम सत्य " का अर्थ -
मृत्यु से शरीर नहीं,अहंकार डरता है | डर तब लगता है जब " मैं " छूटने वाला हो, पहचान टूटने वाली हो और नियंत्रण खत्म होने जा रहा हो | मृत्यु या मृत्यु के समीप अवस्था में डर का केंद्र (एमिगडाला ) अति सक्रिय हो जाता है, फाइट और फ्लाइट की अंतिम कोशिश की जाती है | प्री -फ्रंटल कोरटेक्स कमजोर पड़ जाता है, " मैं कौन हूं " वाली कहानी टूटने लग जाती है और व्यक्ति अर्थ खोजने लगता है |
ऐसे में "राम नाम सत्य है " मस्तिष्क के अंतिम अर्थ सूत्र के रूप में सामने आता है, अर्थात दिमाग को संदेश मिलता है - जो जा रहा है या छूट रहा है वह असत्य ( शरीर ) है और जो "है "वह सत्य (चेतना ) है |
इससे डर -अर्थ में बदल जाता है "राम नाम सत्य है " का उच्चारण - यह मृत्यु को "अर्थ" में बदल देता है l ईगो डिसोल्यूशन शुरू होकर प्रतिरोध के स्थान पर स्वीकार्यता आती है और व्यक्ति शांत होना शुरू कर देता है |
यहाँ "राम नाम सत्य है " में सत्य का मतलब "सच" नहीं है | सत्य का मतलब है - जो बदलता नहीं है - शरीर बदलता है,भावनाएं बदलती है, नाम-रूप बदलते हैं, लेकिन चेतना नहीं बदलती है |
इसलिए राम नाम सत्य है - मृत्यु को नकारता नहीं है ,उसे समझ में बदलकर अहंकार को दूर करता है | राम नाम सत्य है - यह मात्र धार्मिक विश्वास नहीं है ,आज का विज्ञान यह मानता है कि अर्थहीन जीवन में मृत्यु भय अधिक होता है जब अर्थ मिल जाता है तो मृत्यु सहज हो जाती है - "राम " नाम यही कार्य करता है |
💧आधुनिक जीवन में "राम"-
आधुनिक युग का मनुष्य सूचनाओं से भरा लेकिन अर्थ से खाली है, गति में तेज किंतु स्थिरता में कमजोर है | राम नाम- गति को रोककर,अर्थ प्रदान कर मन को केंद्र में लाने का कार्य करता है | राम नाम भागने से नहीं,ठहरने से जुड़ा हुआ है |
राम कोई धर्म नहीं है, राम कोई कहानी नहीं है और राम कोई व्यक्ति भी नहीं है | राम वह अवस्था है जहां मन और मस्तिष्क दोनों शांत हो जाते हैं और यह मात्र आस्था नहीं बल्कि साइंस और अनुभव दोनों की कसौटी पर परखा हुआ है |
इसलिए दोस्तों, गर मन थक जाए,शब्द खत्म हो जाए और जीवन बोझ लगने लगे तो बस एक नाम याद रखें - "राम " |
कृपया लेख पर अपने विचार अवश्य व्यक्त करें 🙏🙏
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