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जब लगे कि जीवन में कोई रास्ता नहीं बचा… तब रुकिए: कहानी अभी खत्म नहीं हुई है |

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withrbansal           आत्महत्या क्यों ? जब जीवन असहनीय लगे तब यह लेख जरूर पढ़ें   Suicide के Spiritual और Practical Aspects  - शायद यह लेख किसी एक जिंदगी को बचा दे  “कभी-कभी इंसान जिंदगी ख़त्म नहीं करना चाहता… वह केवल उस दर्द से मुक्त होना चाहता है जिसे वह और सहन नहीं कर पा रहा।” शायद आत्महत्या को समझने की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए। अगर आज आपको भी लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है, तो बस एक पल रुकिए… हो सकता है आपकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत अध्याय अभी लिखा ही न गया हो। याद रखिए - एक कठिन परिस्थिति पूरी जिंदगी का फैसला नहीं होती। कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। 🚨 यदि आप अभी तत्काल खतरे में हैं -  दोस्त , यदि आपके मन में अभी आत्महत्या करने या स्वयं को नुकसान पहुँचाने का विचार आ रहा है, तो अभी कोई अंतिम निर्णय न लें और अकेले न रहें और -  तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताइए कि - “ मेरे मन में आत्महत्या के विचार आ रहे हैं, कृपया मेरे साथ रहें।”.... ऐसी जगह या वस्तुओं से दूर हो जाइए जिनसे आप स्वयं को नुकसान पहुँचा सकते हैं। @ भारत में Tele-MANAS: 14...

हर इंसान की अपनी एक संजीवनी होती है: हनुमान जी से सीखिए संकट में जीवन को फिर से कैसे खड़ा करें |

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withrbansal संजीवनी बूटी का रहस्य: क्या मृत्यु को हराने से भी बड़ा था उसका जीवन संदेश ? दोस्तों, जीवन में हर व्यक्ति कभी न कभी ऐसी परिस्थिति में अवश्य पहुँचता है, जहाँ उसे लगता है कि अब सब कुछ समाप्त हो गया। उसी क्षण उसे अपनी 'संजीवनी' खोजनी होती है l  याद करें रामायण का वह प्रसंग जब भगवान राम भी असहाय दिखाई दिए…रामायण का यह प्रसंग केवल युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि मानव जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई का प्रतीक भी है। लंका का युद्ध अपने निर्णायक मोड़ पर था। धर्म और अधर्म आमने-सामने खड़े थे। तभी रावण का पुत्र मेघनाद अपनी दिव्य शक्ति का प्रयोग करता है। उसका शक्तिबाण लक्ष्मण को गंभीर रूप से घायल कर देता है। लक्ष्मण भूमि पर गिर पड़ते हैं। उनका शरीर निश्चेष्ट है। श्रीराम अपने प्रिय भाई का सिर गोद में रखे बैठे हैं। पहली बार ऐसा लगता है मानो स्वयं भगवान भी एक भाई के दुःख से व्याकुल हो उठे हों। इसी समय वैद्य सुषेण कहते हैं - "यदि सूर्योदय से पहले संजीवनी औषधि नहीं पहुँची, तो लक्ष्मण को बचाना अत्यंत कठिन होगा।" बस यही वह क्षण था जिसने इतिहास बदल दिया। हनुमान जी बिना एक क्षण गँवाए द्...

ईश्वर आपको कष्ट क्यों देता है ? संघर्ष का वह रहस्य जो आपकी पूरी सोच बदल देगा |

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withrbansal           क्या वाकई मे जीवन मे आने वाली समस्याएं हमें तोड़ती है ?     दोस्तों, उस दिन नदी के किनारे लौटते समय हवा पहले जैसी ही थी, पानी पहले जैसा ही बह रहा था, पक्षी पहले जैसे ही गा रहे थे। बदल गया था तो केवल मेरा दृष्टिकोण। मेरे भीतर एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था - यदि जीवन का उद्देश्य स्वयं को गढ़ना है, तो फिर जीवन में इतना संघर्ष क्यों है?  यदि आपने इस श्रंखला का पहला भाग नहीं पढ़ा है तो पहले यह अवश्य पढ़े -  जब सब कुछ बदल रहा हो, तब आपको क्या गढ़ना चाहिए ? क्यों कोई व्यक्ति जन्म से ही अभावों में पलता है, जबकि किसी के पास सब कुछ होता है ? क्यों किसी का हृदय प्रेम में टूटता है, किसी का शरीर बीमारी से, किसी का आत्मविश्वास असफलताओं से और किसी का मन अकेलेपन से ?यदि ईश्वर करुणामय है, यदि प्रकृति हमारी मित्र है, तो फिर जीवन हमें इतनी कठिन राहों से क्यों गुज़ारता है? यह प्रश्न केवल मेरा नहीं है, यह हर एक उस मनुष्य का प्रश्न है जिसने कभी जीवन में आँसू बहाए हैं। वर्षों तक मैंने इसका उत्तर पुस्तकों में खोजा। उपनिषदों को पढ़ा, श्रीमद्भगवद्गीत...

धन, घर और सफलता सब मिल जाएँ... फिर भी लोग दुखी क्यों रहते हैं ?

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withrbansal जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि - आपने कितना पाया नहीं, बल्कि आप क्या बन गए ! दोस्तों, मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह सोचता है - 'बस यह मिल जाए, फिर मैं खुश हो जाऊँगा।' लेकिन जीवन का सबसे बड़ा सत्य यह है कि खुशी पाने से नहीं, बनने से आती है।" क्या हम सचमुच जी रहे हैं या केवल पाने की दौड़ में हैं ? कुछ दिन पहले शाम को नदी किनारे टहलते हुए मेरे मन में एक प्रश्न उठा - हम जीवन भर आखिर किसके पीछे भागते रहते हैं ? बचपन में अच्छे अंक चाहिए थे , फिर अच्छी नौकरी, उसके बाद अपना घर ,फिर बड़ा घर,बच्चों का भविष्य,सम्मान,पैसा, सुरक्षा। घर लौटकर मैंने अपनी वर्षों पुरानी डायरी खोली। हर पन्ने पर कोई-न-कोई लक्ष्य लिखा था - "प्रथम आना है..." "सरकारी नौकरी चाहिए..." "अपना घर बनाना है..." "आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना है..." इत्यादि |   लेकिन सबसे बड़ी बात जिसने मुझे  झकझोर दिया कि  पूरी डायरी में कहीं भी यह नहीं लिखा था - "मुझे अधिक धैर्यवान बनना है।" "मुझे ऐसा इंसान बनना है जिस पर लोग भरोसा कर सकें।" "मुझे अपने क्रोध ...

99 प्रतिशत लोग जीवनभर यही गलती करते हैं! पाने की दौड़ छोड़िए, स्वयं को गढ़ना सीखिए

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withrbansal           जब सब कुछ बदल रहा हो, तब आपको क्या गढ़ना चाहिए ? दोस्तों, क्या आपने कभी अपने जीवन में ऐसा क्षण अनुभव किया है, जब बाहर सब कुछ सामान्य था, लेकिन भीतर कुछ हमेशा के लिए बदल गया ? मेरे जीवन में भी ऐसा एक क्षण आया था। वह न किसी पुरस्कार का दिन था, न किसी बड़ी सफलता का। वह एक साधारण-सी शाम थी। सूरज धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे उतर रहा था। आकाश सुनहरे और केसरिया रंगों से रंगा हुआ था। हल्की हवा बह रही थी और दूर लौटते पक्षियों की कतारें आकाश पर सुंदर रेखाएँ बना रही थीं। मैं एक शांत नदी के किनारे अकेला बैठा था। नदी बिना किसी शोर के बह रही थी। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो उसे कहीं पहुँचने की कोई जल्दी ही नहीं हो। मैं उसे देर तक देखता रहा। तभी मन में एक प्रश्न उठा - "क्या यह वही नदी है जिसे मैं पाँच मिनट पहले देख रहा था ?" उत्तर स्पष्ट था - नहीं। जिस जल को मैं अभी देख रहा था, वह कुछ क्षण पहले वहाँ नहीं था। फिर भी हम कहते हैं - "यह वही नदी है।" तभी मन में दूसरा प्रश्न उठा - "यदि पानी बदल गया, तो नदी वही कैसे रही ?" कुछ देर बाद भीतर से उत्तर मिला - ...

जिस दिन अपनी जलती हुई चिता देख लेंगे, उसी दिन जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझ जाएंगे |

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आधुनिक जीवन के चक्रव्यूह में 'जीवनमुक्त' होने का व्यावहारिक दर्शन दोस्तों, एक पल के लिए ठहरिए। अपनी भागती हुई जिंदगी की रफ्तार पर ब्रेक लगाइए और एक ऐसे दृश्य की कल्पना कीजिए जो हमारे वजूद का सबसे बड़ा और अटल सच है। एक शांत, ढलती हुई शाम है। आप एक श्मशान घाट के किनारे खड़े हैं। आपके सामने लकड़ी के ढेरों के बीच से लाल-नारंगी लपटें तेजी से आसमान की तरफ लपक रही हैं। लकड़ियों के चटकने की आवाजें आ रही हैं, और हवा में इंसानी मांस और कफन के जलने की एक अजीब सी गंध तैर रही है। वहाँ खड़े दस-बारह लोग बिना कुछ बोले, शून्य में आँखें टिकाए उस राख होती देह को देख रहे हैं। वहाँ एक ऐसा सन्नाटा है जो कानों को फाड़ देने वाली चीख से भी ज्यादा गहरा है। अब इस दृश्य में एक खौफनाक बदलाव कीजिए कल्पना कीजिए कि उस धधकती चिता पर जो शव लेटा है, वह किसी अजनबी का नहीं, वरन आपका अपना है। आपके फेफड़ों ने हवा को खींचना बंद कर दिया है। जिन आँखों ने सुबह दफ्तर जाने के लिए अलार्म देखा था, वे अब हमेशा के लिए पथरा चुकी हैं, और आपकी चेतना (आत्मा) उस चिता से दस फीट ऊपर हवा में तैरती हुई नीचे झुकी है, और अपनी ही उस लाश...