withrbansal जब सब कुछ बदल रहा हो, तब आपको क्या गढ़ना चाहिए ? दोस्तों, क्या आपने कभी अपने जीवन में ऐसा क्षण अनुभव किया है, जब बाहर सब कुछ सामान्य था, लेकिन भीतर कुछ हमेशा के लिए बदल गया ? मेरे जीवन में भी ऐसा एक क्षण आया था। वह न किसी पुरस्कार का दिन था, न किसी बड़ी सफलता का। वह एक साधारण-सी शाम थी। सूरज धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे उतर रहा था। आकाश सुनहरे और केसरिया रंगों से रंगा हुआ था। हल्की हवा बह रही थी और दूर लौटते पक्षियों की कतारें आकाश पर सुंदर रेखाएँ बना रही थीं। मैं एक शांत नदी के किनारे अकेला बैठा था। नदी बिना किसी शोर के बह रही थी। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो उसे कहीं पहुँचने की कोई जल्दी ही नहीं हो। मैं उसे देर तक देखता रहा। तभी मन में एक प्रश्न उठा - "क्या यह वही नदी है जिसे मैं पाँच मिनट पहले देख रहा था ?" उत्तर स्पष्ट था - नहीं। जिस जल को मैं अभी देख रहा था, वह कुछ क्षण पहले वहाँ नहीं था। फिर भी हम कहते हैं - "यह वही नदी है।" तभी मन में दूसरा प्रश्न उठा - "यदि पानी बदल गया, तो नदी वही कैसे रही ?" कुछ देर बाद भीतर से उत्तर मिला - ...