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आपके साथ वही होता है, जो आपके भीतर बार-बार होता है।

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withrbansal   क्या हम अपनी नियति साथ लेकर आते हैं ? दोस्तों, एक ऐसा सवाल जो हर इंसान के मन में कभी ना कभी अवश्य उठता है -  "मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है ? ", " मैं ना चाहते हुए भी बार-बार वही गलती क्यों करता हूँ ?  "  कुछ लोग बिना प्रयास आगे बढ़ जाते हैं और कुछ पूरा जीवन संघर्ष में क्यों फँसे रहते हैं ? क्या यहाँ सब कुछ पहले से तय है ? किसी दुर्घटना के बाद, किसी असफलता के बाद, किसी बीमारी, तलाक, या अचानक मिली सफलता के बाद -  यह सवाल भीतर से उभरता है - “क्या मैं अपनी नियति साथ लेकर आया हूँ ?” आधुनिक विज्ञान इसे मस्तिष्क की "बायो -केमिकल प्रक्रियाएँ "  कहता है। भारतीय दर्शन इसे कर्म, संस्कार और प्रारब्ध कहता है। भाषा अलग है,दृष्टिकोण अलग है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से - निष्कर्ष एक ही है। दोस्तों, आधुनिक न्यूरोसाइंस ( मस्तिष्क की बायो केमिस्ट्री ) एवं भारतीय "कर्म सिद्धांत " देखने में भले ही अलग-अलग लगे लेकिन गहराई में जाकर दोनों एक ही सत्य की ओर इशारा करते है कि - मनुष्य अपने भविष्य का निर्माता स्वयं है |   अर्थात हम जैसा सोचते, अनुभव करते और कर्...

" राम "- एक नाम जो मन को थाम लेता है |

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withrbansal "राम"- चेतना,मस्तिष्क और जीवन प्रक्रिया के स्तर पर |  दोस्तों, जब कोई व्यक्ति अत्यधिक दुख में होता है,डर में होता है, मृत्यु के निकट होता है या जीवन से थक चुका होता है तो अनायास ही उसके मुख से निकलता है - " राम " ! क्या यह मनुष्य की कोई सीखी या सिखाई हुई प्रतिक्रिया है ? नहीं, यह मन की सबसे गहरी स्मृति से उठी हुई आवाज होती है |                                                                                   अब सवाल यह है कि आखिर "राम " नाम में ऐसा क्या है जो सदियों से हर उम्र, हर वर्ग, हर परिस्थिति में मनुष्य का सहारा बना हुआ है ? क्या यह सिर्फ आस्था है या इसके पीछे कोई गहरा मनोवैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल रहस्य छुपा हुआ है ?                                          ...

क्या हम सच्ची दुनिया में जी रहे हैं या किसी सुपर-कंप्यूटर के सिमुलेशन में ?

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withrbansal             क्या हम किसी विशाल कंप्यूटर प्रोग्राम का हिस्सा है ? दोस्तों, कल्पना कीजिए कि किसी दिन हम सुबह उठें और यह पता चले कि जिस दुनिया को हम  “हक़ीक़त” समझ रहे थे—हमारा घर, परिवार, हमारा  काम,हमारी परेशानियाँ, हमारी खुशियाँ ,हमारे  सुख -दुःख इत्यादि सब किसी विशाल कंप्यूटर प्रोग्राम का हिस्सा हैं l पहली नज़र में यह पागलपन लगता है। लेकिन यही विचार आज विज्ञान और दर्शन की दुनिया में गंभीर रूप से चर्चा का विषय है। दुनिया के सबसे प्रभावशाली टेक उद्यमी एलन मस्क, ऑक्सफ़ोर्ड के दार्शनिक निक बॉस्ट्रॉम, MIT के वैज्ञानिक मैक्स टेगमार्क, और दुनिया भर के AI शोधकर्ता मानते हैं कि -  “हमारे सिमुलेशन में जीने की संभावना वास्तविक दुनिया में जीने से कहीं ज़्यादा है।” क्या यह सच है या यह सिर्फ एक दिमागी खेल है ? दोस्तों,इस लेख में हम इस सवाल को बहुत सरल एवं दैनिक जीवन के उदाहरणों के साथ समझेंगे। 💙 सिमुलेशन हाइपोथेसिस क्या है ?- सिमुलेशन थ्योरी यह कहती है कि - हमारी यह दुनिया असली नहीं है। यह एक उन्नत सभ्यता द्वारा बनाया गया एक हाई-लेव...

क्यों मनुष्य अपने ही अनुभवों का बंदी बनकर बार-बार धरती पर लौटता है |

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withrbansal आत्मा की अधूरी यात्रा: क्या है पुनर्जन्म का रहस्य ? दोस्तों,क्या आपने कभी सोचा है — क्यों कुछ लोग जन्म से ही दुखों में पलते हैं और कुछ लोग बिना किसी बड़े प्रयास के खुशहाल जीवन जीते हैं ?  क्यों कोई बच्चा संगीत में नैसर्गिक रूप से निपुण होता है, तो कोई बचपन से ही दार्शनिक बातों में रुचि लेता है? क्यूँ कोई व्यक्ति बहुत कम उम्र में प्रसिद्धि पा लेता है तो दूसरा होश सँभालते ही खुद को भीख मांगते हुए पाता है ?                                                         क्या यह सब मात्र संयोग है या इसके पीछे कोई अदृश्य योजना काम करती है ? “मनुष्य बार-बार धरती पर क्यों लौटता है?”  यह प्रश्न जितना गूढ़ है, उतना ही हमारे लिए आवश्यक है इसका उत्तर जानना,  क्योंकि इसका उत्तर हमें बताता है कि हमारा अस्तित्व केवल इस एक जन्म की कहानी नहीं है;  बल्कि आत्मा के विकास की लंबी, अधूरी और सुंदर यात्रा है l यह भी पढ़े -  क्या हमारे जीवन का क...

जब ‘चिट्ठी आई है’ से आँखें नम हों और ‘ओम नमः शिवाय’ से आत्मा शांत

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withrbansal                   भौतिकता और आध्यात्मिकता - एक ही नदी की दो धाराएँ  दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि “जीवन की गाड़ी” दो पहियों पर चलती है – एक भौतिक (Material) और एक आध्यात्मिक (Spiritual)?                                  एक तरफ़ है – धन सम्पति, पद प्रतिष्ठा, EMI, प्रोमोशन, सोशल मीडिया पर लाइक गिनती और Society में रुतबा। दूसरी तरफ़ – वो खामोश रातें जब आप छत पर लेटकर सोचते हैं --“क्या सब कुछ होने के बाद भी कुछ छूटा हुआ सा नहीं है ?”                                 जी हाँ! यही है वो द्वंद्व जो हर मनुष्य के जीवन में चलता है। और यही है इस लेख का धड़कता हुआ दिल – भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के बीच वो अनदेखा पुल, जिस पर चलते हुए हम या तो गिर जाते हैं -- या जीवन को पा लेते हैं।                         और हाँ...