जिस दिन अपनी जलती हुई चिता देख लेंगे, उसी दिन जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझ जाएंगे |
आधुनिक जीवन के चक्रव्यूह में 'जीवनमुक्त' होने का व्यावहारिक दर्शन दोस्तों, एक पल के लिए ठहरिए। अपनी भागती हुई जिंदगी की रफ्तार पर ब्रेक लगाइए और एक ऐसे दृश्य की कल्पना कीजिए जो हमारे वजूद का सबसे बड़ा और अटल सच है। एक शांत, ढलती हुई शाम है। आप एक श्मशान घाट के किनारे खड़े हैं। आपके सामने लकड़ी के ढेरों के बीच से लाल-नारंगी लपटें तेजी से आसमान की तरफ लपक रही हैं। लकड़ियों के चटकने की आवाजें आ रही हैं, और हवा में इंसानी मांस और कफन के जलने की एक अजीब सी गंध तैर रही है। वहाँ खड़े दस-बारह लोग बिना कुछ बोले, शून्य में आँखें टिकाए उस राख होती देह को देख रहे हैं। वहाँ एक ऐसा सन्नाटा है जो कानों को फाड़ देने वाली चीख से भी ज्यादा गहरा है। अब इस दृश्य में एक खौफनाक बदलाव कीजिए कल्पना कीजिए कि उस धधकती चिता पर जो शव लेटा है, वह किसी अजनबी का नहीं, वरन आपका अपना है। आपके फेफड़ों ने हवा को खींचना बंद कर दिया है। जिन आँखों ने सुबह दफ्तर जाने के लिए अलार्म देखा था, वे अब हमेशा के लिए पथरा चुकी हैं, और आपकी चेतना (आत्मा) उस चिता से दस फीट ऊपर हवा में तैरती हुई नीचे झुकी है, और अपनी ही उस लाश...