आपके साथ वही होता है, जो आपके भीतर बार-बार होता है।

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 क्या हम अपनी नियति साथ लेकर आते हैं ?

Symbolic image of human brain neurons merging with meditation and awareness


दोस्तों, एक ऐसा सवाल जो हर इंसान के मन में कभी ना कभी अवश्य उठता है -  "मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है ? ", " मैं ना चाहते हुए भी बार-बार वही गलती क्यों करता हूँ ? " कुछ लोग बिना प्रयास आगे बढ़ जाते हैं और कुछ पूरा जीवन संघर्ष में क्यों फँसे रहते हैं ?

Person trapped in a repeating life pattern and habit loop


क्या यहाँ सब कुछ पहले से तय है ? किसी दुर्घटना के बाद, किसी असफलता के बाद, किसी बीमारी, तलाक, या अचानक मिली सफलता के बाद -  यह सवाल भीतर से उभरता है - “क्या मैं अपनी नियति साथ लेकर आया हूँ ?”

आधुनिक विज्ञान इसे मस्तिष्क की "बायो -केमिकल प्रक्रियाएँ "  कहता है। भारतीय दर्शन इसे कर्म, संस्कार और प्रारब्ध कहता है। भाषा अलग है,दृष्टिकोण अलग है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से - निष्कर्ष एक ही है।

दोस्तों, आधुनिक न्यूरोसाइंस ( मस्तिष्क की बायो केमिस्ट्री ) एवं भारतीय "कर्म सिद्धांत " देखने में भले ही अलग-अलग लगे लेकिन गहराई में जाकर दोनों एक ही सत्य की ओर इशारा करते है कि - मनुष्य अपने भविष्य का निर्माता स्वयं है | अर्थात हम जैसा सोचते, अनुभव करते और कर्म करते हैं, वैसा ही हमारा जीवन बनता है।

💙 विज्ञान कहता है - "मस्तिष्क" ही जीवन की दिशा तय करता है - 

Neural pathways in the brain symbolizing habits and conditioning

जब एक बच्चा इस दुनिया में आता है, तो वह कोरा काग़ज़ नहीं होता, वह अपने साथ लेकर आता है -  DNA (आनुवंशिक कोड), मस्तिष्क की संरचना हार्मोनल संतुलन, भावनात्मक संवेदनशीलता, डर, साहस, जिज्ञासा जैसी प्रवृत्तियाँ l

दो बच्चे एक ही घर में पलते हैं - एक जोखिम उठाता है, दूसरा डरता है। एक नेतृत्व करता है, दूसरा पीछे रहता है। क्यों ? क्योंकि उनके मस्तिष्क में डोपामिन, सेरोटोनिन, कोर्टिसोल, ऑक्सीटोसिन जैसे रसायनो का संतुलन अलग-अलग होता है। मतलब साफ है - जन्म से पहले ही बहुत कुछ तय हो जाता है l

विज्ञान इसे "Neurochemical Predisposition " ( जैविक रूप में जमी हुई कर्म-स्मृति ) कहता है अर्थात व्यक्ति का मस्तिष्क कुछ विशेष रसायनों के प्रति पहले से झुका हुआ (biased) होता है, जिसके कारण वह बार-बार एक ही तरह का सोचना, महसूस करना और निर्णय लेना पसंद करता है।

💨 मस्तिष्क निर्णय पहले लेता है, “आप” बाद में -

यह जानकर आपको झटका लग सकता है, न्यूरोसाइंस के प्रसिद्ध प्रयोग बताते हैं कि आपके कोई निर्णय लेने से 0.3 से 0.5 सेकंड पहले ही मस्तिष्क निर्णय ले चुका होता है, चेतना बाद में उसे “मेरा निर्णय” मानती है। यानी आप सोचते हैं - “मैंने चुना”-  जबकि असल में यह आपके भीतर की केमिस्ट्री ने चुना होता है l

💨 विज्ञान कहता है - हर अनुभव मस्तिष्क में न्यूरल पाथवे बनाता है- 

आपके मस्तिष्क में आपके हर विचार, भावना और निर्णय के साथ विशिष्ट रसायन (Neurochemicals) सक्रिय होते हैं जैसे -
 डोपामिन → प्रेरणा, लालसा, पुरस्कार
सेरोटोनिन → संतुलन, संतोष
कॉर्टिसोल → भय, तनाव
ऑक्सीटोसिन → प्रेम, विश्वास

बार-बार दोहराए गए विचार उन्हीं रसायनों को बार-बार स्राव करते है जिससे मस्तिष्क में वही न्यूरल पाथवे मजबूत होता है जो कि वही व्यवहार और आदत को ट्रिगर करता है जिससे वही जीवन का परिणाम प्राप्त होता है | अर्थात विचार → रसायन → आदत → भाग्य

हार्मोनल प्रतिक्रिया छोड़ता है, स्मृति के साथ भाव जोड़ता है,धीरे-धीरे वही सोच,वही प्रतिक्रिया,वही निर्णय और वही परिणाम, फलस्वरूप वही परिस्थितियाँ,वही रिश्ते,वही संघर्ष l

इसलिए व्यक्ति कहता है: “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?” विज्ञान कहता है - क्योंकि आपका मस्तिष्क वही रास्ता जानता है।

💙 आध्यात्मिक दृष्टिकोण -मनुष्य अपने ही कर्मों से बने स्वभाव से बँधा होता है- 


अध्यात्म में इसी सत्य को हजारों वर्ष पहले ही "कर्म सिद्धांत " के रूप में प्रस्तुत किया जा चुका है |भारतीय दर्शन में कर्म का अर्थ केवल क्रिया नहीं, बल्कि -
 विचार + भावना + संकल्प + क्रिया = कर्म

जैसा कर्म → वैसा संस्कार,जैसे संस्कार → वैसी प्रवृत्ति, जैसी प्रवृत्ति → वैसा भाग्य |कर्म भी धीरे-धीरे मन की संरचना बदल देता है l

कर्म सिद्धांत में भारतीय दर्शन कहता है कि हर आत्मा तीन प्रकार के कर्म लेकर चलती है -
 
प्रथम -संचित कर्म -  पिछले जन्मों का संचित कर्म भंडार |

द्वितीत -प्रारब्ध कर्म -  जन्म का अदृश्य ब्लु प्रिंट जो इस जन्म में फल देने हैं अर्थात संचित कर्म का एक भाग जिसे वर्तमान जन्म में भोगा जाना है |

अंतिम - क्रियमाण कर्म - जो कर्म इस जन्म में अभी किए जा रहे हैं |

प्रारब्ध कर्म ही तय करता है- जन्म कहाँ होगा शरीर कैसा होगा, बुद्धि कैसी होगी, स्वभाव कैसा होगा,जीवन की शुरुआती परिस्थितियाँ क्या होंगी यही वह बिंदु है जहाँ विज्ञान और अध्यात्म हाथ मिलाते हैं।

गीता कहती है - “स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा” (गीता 18.60) अर्थात मनुष्य अपने ही कर्मों से बने स्वभाव से बँधा होता है। विज्ञान जिन्हें - हैबिट लूप, न्यूरल वायरिंग कहता है, धर्म उन्हें कहता है- संस्कार, वासनाएँ,  बात एक ही है।


💚 व्यक्ति बार-बार वही गलती क्यों करता है ?

एक व्यक्ति बार-बार गलत रिश्ते चुनता है। दूसरा बार-बार पैसा खोता है। तीसरा बार-बार क्रोध में निर्णय लेता है। धर्म कहता है -संस्कार सक्रिय हैं। विज्ञान कहता है- Neural Pathways मजबूत हैं। और दोनों इस बात पर सहमत हैं कि जब तक चेतना नहीं बदलती, परिणाम नहीं बदलेगा l 

💙 तो क्या सब कुछ पहले से तय होता है ? -

Symbolic balance between karma and conscious choice

इस प्रश्न का उत्तर पूर्णतया "हाँ " या "ना " में नहीं दिया जा सकता है l  विज्ञान में इसका जबाब है - " न्यूरोप्लास्टिसिटी " अर्थात मस्तिष्क की रासायनिक संरचना स्थिर नहीं है, उसमें फेरबदल किया जा सकता है - ध्यान से आदतों से, वातावरण से, शब्दों से,श्वास से, यही Neuroplasticity है।

अध्यात्म का उत्तर है - नियति को एक सीमा तक अपने पक्ष में किया जा सकता है, और इसके साधन है - पुरुषार्थ और साधना l ज्ञान से कर्म कटते हैं, साधना से संस्कार जलते हैं, जागरूकता से प्रारब्ध ढीला पड़ता है, इसलिए गीता कहती है- “उद्धरेदात्मनाऽत्मानं”  अपना उद्धार स्वयं करो।

💙 वह बिंदु जहाँ विज्ञान और अध्यात्म एक हो जाते हैं -

दोनों की शब्दावली अलग है लेकिन बात एक ही है l भाषा बदली है, सत्य एक ही है l विज्ञान की Brain Chemistry अध्यात्म में "संस्कार ",Neural Pathways- वासनाएँ, Genetic Tendency- प्रारब्ध, Awareness-- साक्षी भाव, Calm State-समाधि एवं Habit Change - साधना बन जाते है l

जो विचार आप रोज़ जीते हैं-  वही आपके मस्तिष्क का “डिफ़ॉल्ट मोड” बन जाते हैं, वही आपके कर्म बनते हैं और वही आपका भाग्य l भाग्य कोई रहस्यमय शक्ति नहीं, बल्कि बार-बार दोहराए गए विचारों और कर्मों की बायोलॉजिकल मेमोरी है।

इसीलिए शास्त्र कहते हैं - " मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो: " अर्थात मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है। यदि मन अचेतन, प्रतिक्रियात्मक और पुराने संस्कारों में उलझा है तो वही बंधन बनता है। यदि मन जागरूक, साक्षी और विवेकपूर्ण है तो वही मुक्ति का द्वार बन जाता है।

 विज्ञान कहता है - "Neurons that fire together, wire together."  अर्थात जो विचार, भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ बार-बार सक्रिय होती हैं, मस्तिष्क में वही न्यूरल कनेक्शन मजबूत हो जाते हैं और वही व्यवहार, आदत और जीवन-दिशा बनाते हैं l

भाषा अलग है, सत्य एक ही है अर्थात यह पंक्ति कहती है कि - कर्म-सिद्धांत कोई कपोल कल्पना नहीं है और बायोकेमिस्ट्री केवल रसायन नहीं है l दोनों मिलकर एक ही बात बताते हैं कि मनुष्य अपने भविष्य का निर्माता स्वयं है l 


💙 क्या हम “जहाँ पहुँचना होता है, वहीं पहुँचते हैं” -

इसका अर्थ यह नहीं कि - “कुछ भी करो, वही होगा।” इसका अर्थ है- जब तक आपकी चेतना वही है,आप वही निर्णय लेंगे जो आपको वहीं ले जाएँगे। चेतना बदली →मस्तिष्क बदला,निर्णय बदले, कर्म बदले, दिशा बदली l 

💙 ऐसे में क्या किया जाना चाहिए --

1 दोष देना बंद करें - आपका बॉस, परिवार, समाज —ये ट्रिगर हैं, कारण नहीं। कारण है - आपकी प्रतिक्रिया।

2 पीड़ित से साक्षी बनें - घटना पर ध्यान न दें, अपनी प्रतिक्रिया देखें। यहीं से परिवर्तन शुरू होता है।

3 रोज़ का एक छोटा अभ्यास - दिन में एक निश्चित समय पर 5-10 मिनट चुप बैठें,श्वास पर ध्यान दें,प्रतिक्रिया आने से पहले ठहरें,यही विज्ञान में, Nervous System Reset यही अध्यात्म में- साधना l

Person observing thoughts calmly in witness consciousness

💚 नियति और स्वतंत्रता  -

अंतिम सत्य यह है कि - भाग्य आपको मंच देता है, लेकिन अभिनय कैसा होगा यह आपकी चेतना तय करती है। आप नियति लेकर आते हैं यह सही है लेकिन आप उसे समझकर जागरूकता से पार भी कर सकते हैं, यह भी उतना ही सत्य है।

दोस्तों, आप दोषी नहीं हैं,आप असहाय भी नहीं हैं ,आप एक प्रोग्राम भी नहीं है , आप एक जागरूक प्रणाली हैं, हर हालात में परिवर्तन संभव है और यही मानव जीवन का उद्देश्य भी है | जब इंसान यह समझ जाता है कि उसकी नियति उसके भीतर है, तभी वह मुक्त होना शुरू करता है। 
दोस्तों, लेख पर कमैंट्स में अपने विचार अवश्य व्यक्त करें l 
Withrbansal 









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