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घर रणभूमि नहीं, साधना-भूमि है!

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withrbansal              परिवार ही आपके आत्म विकास की प्रयोगशाला है |  दोस्तों, “घर” सिर्फ चार दीवारों का नाम नहीं है। यह वह स्थान है जहाँ मन थककर लौटता है, आत्मा विश्राम चाहती है, और हृदय अपनापन खोजता है। लेकिन जब उसी घर में— मतभेद टकराव बन जाएँ, संवाद आरोप बन जाएँ,अपेक्षाएँ बोझ बन जाएँ, और अहंकार प्रेम से बड़ा हो जाए—तो घर शांति का केंद्र नहीं रहता। वह रणभूमि बन जाता है। और यही वह क्षण है जहाँ से परिवार या तो टूटता है— या तपकर और मजबूत बनता है।  परिवार में टकराव के मूल में समस्या व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति है- चाहे पति-पत्नी का संबंध हो, माता-पिता और बच्चों का हो, भाई-भाई का हो, सास-बहू का हो— संघर्ष का मूल कारण “प्रेम की कमी” नहीं होता। अक्सर कारण होता है -अहंकार, अपेक्षाएँ और नियंत्रण की इच्छा। हम चाहते हैं कि - जीवनसाथी वैसा सोचे जैसा हम सोचते हैं, बच्चे वैसा बनें- जैसा हम चाहते हैं। माता-पिता वैसा व्यवहार करें जैसा हमें सही लगता है।और जब ऐसा नहीं होता है तो हम कहते हैं, “मेरे साथ अन्याय हुआ।” सच यह है - अधिकतर अन्याय हम अपनी अपेक्षाओं से स...