99% लोग जीवनभर यही गलती करते हैं! पाने की दौड़ छोड़िए, स्वयं को गढ़ना सीखिए
withrbansal
जब सब कुछ बदल रहा हो, तब आपको क्या गढ़ना चाहिए ?
दोस्तों, क्या आपने कभी अपने जीवन में ऐसा क्षण अनुभव किया है, जब बाहर सब कुछ सामान्य था, लेकिन भीतर कुछ हमेशा के लिए बदल गया ? मेरे जीवन में भी ऐसा एक क्षण आया था। वह न किसी पुरस्कार का दिन था, न किसी बड़ी सफलता का। वह एक साधारण-सी शाम थी। सूरज धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे उतर रहा था। आकाश सुनहरे और केसरिया रंगों से रंगा हुआ था। हल्की हवा बह रही थी और दूर लौटते पक्षियों की कतारें आकाश पर सुंदर रेखाएँ बना रही थीं।
मैं एक शांत नदी के किनारे अकेला बैठा था। नदी बिना किसी शोर के बह रही थी। उसे देखकर ऐसा लगता था मानो उसे कहीं पहुँचने की कोई जल्दी ही नहीं हो। मैं उसे देर तक देखता रहा। तभी मन में एक प्रश्न उठा - "क्या यह वही नदी है जिसे मैं पाँच मिनट पहले देख रहा था ?" उत्तर स्पष्ट था - नहीं। जिस जल को मैं अभी देख रहा था, वह कुछ क्षण पहले वहाँ नहीं था। फिर भी हम कहते हैं - "यह वही नदी है।"
तभी मन में दूसरा प्रश्न उठा - "यदि पानी बदल गया, तो नदी वही कैसे रही ?" कुछ देर बाद भीतर से उत्तर मिला - "नदी की पहचान उसके पानी से नहीं, उसके बहने से होती है।" यही उत्तर उस शाम मेरे जीवन का एक नया आरंभ बन गया।
फिर मन ने एक और प्रश्न पूछा - "यदि नदी का सत्य बहना है, तो मनुष्य का सत्य क्या है?" यहीं से मेरी आत्मयात्रा प्रारंभ हुई।
मैंने सोचा - जिस शरीर को मैं "मैं" कहता हूँ, वह बचपन वाला शरीर नहीं है। मेरे विचार बदल चुके हैं, मेरी पसंद बदल चुकी है, मेरे मित्र बदल चुके हैं, मेरे डर बदल चुके हैं, मेरे सपने बदल चुके हैं। जिन घटनाओं पर कभी मैं रात-रात भर रोया था, आज उन्हें याद करके मुस्कुरा देता हूँ। यदि इतना सब बदल गया, तो फिर "मैं" कौन हूँ?
धीरे-धीरे एक गहरा सत्य स्पष्ट होने लगा - मनुष्य कोई स्थिर वस्तु नहीं है। वह एक निरंतर बनने, सीखने, गिरने, उठने और विकसित होने वाली जीवंत प्रक्रिया है।
जीवन किसी स्थिर तस्वीर का नाम नहीं है, जीवन एक चलचित्र है l जीवन किसी पत्थर का नाम नहीं है, जीवन एक बहती हुई नदी है। और शायद हमारी सबसे बड़ी भूल यही है कि हम बहती हुई नदी में स्थायी घर बनाने का प्रयास करते हैं।
बचपन से हमें एक ही दिशा में चलना सिखाया जाता है - अच्छे अंक लाओ, अच्छी नौकरी पाओ, अधिक धन कमाओ, बड़ा घर बनाओ, प्रतिष्ठा कमाओ, पहचान बनाओ इत्यादि l यदि इन सभी बातों को ध्यान से देखें तो पाएँगे कि इनका केंद्र केवल एक शब्द है - "पाना।" लेकिन बहुत कम लोग हमें यह सिखाते हैं - अधिक धैर्यवान कैसे बनें ? अधिक करुणामय कैसे बनें ? अधिक ईमानदार कैसे बनें? अधिक शांत कैसे बनें? अधिक विश्वसनीय कैसे बनें?
हमने पूरी पीढ़ी को उपलब्धियाँ कमाना तो सिखाया, लेकिन व्यक्तित्व गढ़ना नहीं सिखाया। यही कारण है कि आज सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन शांति घट गई है। जानकारी बढ़ गई है, लेकिन आत्मबोध कम हो गया है। संपर्क बढ़ गए हैं, लेकिन संबंध गहरे नहीं हुए। लोग सफल हुए हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं हुए। क्यों?
क्योंकि उन्होंने बहुत कुछ पाया, लेकिन स्वयं को गढ़ने का समय नहीं निकाला। पाना और गढ़ना - दो अलग यात्राएँ है l यदि आपके हाथ में सोने की घड़ी है, तो आपने एक वस्तु प्राप्त की है। लेकिन यदि आपने समय का सम्मान करना सीख लिया है, तो आपने स्वयं को गढ़ा है। यदि आपके पास विशाल घर है, तो आपने संपत्ति अर्जित की है। लेकिन यदि उस घर में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति सम्मान, अपनापन और सुरक्षा महसूस करता है, तो आपने अपना व्यक्तित्व गढ़ा है।
यदि आपके पास ऊँचा पद है, तो वह समाज ने दिया है। लेकिन यदि आपके पास श्रेष्ठ चरित्र है, तो उसे आपने स्वयं बनाया है।धन कम हो सकता है, पद छिन सकता है, प्रसिद्धि मिट सकती है लेकिन सत्य, करुणा, अनुशासन, धैर्य और विनम्रता जैसी आंतरिक संपत्ति कोई नहीं छीन सकता। यही मनुष्य की वास्तविक पूँजी है।
💙प्रकृति हमें क्या सिखाती है ? -
प्रकृति में कोई भी महान रचना एक दिन में नहीं बनती। बीज धीरे-धीरे वृक्ष बनता है। नदी सदियों में घाटियाँ बनाती है। कोयला वर्षों के दबाव से हीरा बनता है। शिशु नौ महीने अंधेरे गर्भ में रहकर जन्म लेता है l प्रकृति कभी जल्दबाज़ी नहीं करती। लेकिन वह कभी रुकती भी नहीं। यही उसका रहस्य है और शायद मनुष्य का भी यही रहस्य है - प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा बेहतर बनना।
💙स्वयं को गढ़ने की पाँच दैनिक आदतें -
यदि आप सचमुच अपने जीवन को बदलना चाहते हैं, तो प्रतिदिन केवल पाँच छोटे अभ्यास प्रारंभ करें -
1. प्रतिदिन कुछ नया सीखें - ज्ञान केवल जानकारी नहीं, दृष्टिकोण बदलता है।
2. किसी एक व्यक्ति का जीवन थोड़ा आसान बनाएँ - सेवा व्यक्तित्व को निखारती है।
3. अपनी एक कमजोरी पहचानकर उस पर काम करें - आत्मविकास ईमानदारी से शुरू होता है।
4. प्रतिदिन दस मिनट मौन में बैठें - मौन हमें स्वयं से मिलाता है।
5. रात को स्वयं से दो प्रश्न पूछें - आज मैंने क्या पाया ? और आज मैंने अपने भीतर क्या गढ़ा ? यदि दूसरा प्रश्न आपके जीवन का हिस्सा बन गया, तो धीरे-धीरे आपका पूरा जीवन बदल जाएगा।
💙जीवन सूत्र -
«दुनिया आपको आपके पद से पहचान सकती है, लेकिन जीवन आपको आपके व्यक्तित्व से याद रखता है।»
अंततः जीवन का मूल्य इस बात से नहीं आँका जाएगा कि आपने कितना धन, कितना पद या कितनी प्रसिद्धि अर्जित की। वास्तविक प्रश्न यह होगा - आपने अपने भीतर कैसा मनुष्य गढ़ा ? क्योंकि परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी, समय बदलता रहेगा, शरीर बदलेगा, रिश्ते बदलेंगे, दुनिया बदलती रहेगी। लेकिन यदि आपका चरित्र हर परिवर्तन के बीच प्रकाश देता रहेगा, तभी आपका जीवन वास्तव में सफल कहलाएगा।
आज रात सोने से पहले स्वयं से केवल दो प्रश्न पूछिए - "आज मैंने क्या पाया ?" और फिर - "आज मैंने अपने भीतर क्या गढ़ा ?" हो सकता है, यही दूसरा प्रश्न आपके जीवन की सबसे बड़ी शुरुआत बन जाए।
जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि कुछ पा लेना नहीं, बल्कि ऐसा व्यक्ति बन जाना है जो हर परिस्थिति में प्रकाश बाँट सके।
दोस्तों ,यदि यह लेख आपके जीवन को नई दिशा दे सकता है, तो इसे अपने परिवार, मित्रों और उन लोगों तक अवश्य पहुँचाएँ जो सफलता की दौड़ में स्वयं को भूल चुके हैं। क्योंकि दुनिया को केवल सफल लोगों की नहीं, बल्कि श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले मनुष्यों की आवश्यकता है।





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