जिस दिन अपनी जलती हुई चिता देख लेंगे, उसी दिन जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझ जाएंगे |

आधुनिक जीवन के चक्रव्यूह में 'जीवनमुक्त' होने का व्यावहारिक दर्शन

दोस्तों, एक पल के लिए ठहरिए। अपनी भागती हुई जिंदगी की रफ्तार पर ब्रेक लगाइए और एक ऐसे दृश्य की कल्पना कीजिए जो हमारे वजूद का सबसे बड़ा और अटल सच है।

एक शांत, ढलती हुई शाम है। आप एक श्मशान घाट के किनारे खड़े हैं। आपके सामने लकड़ी के ढेरों के बीच से लाल-नारंगी लपटें तेजी से आसमान की तरफ लपक रही हैं। लकड़ियों के चटकने की आवाजें आ रही हैं, और हवा में इंसानी मांस और कफन के जलने की एक अजीब सी गंध तैर रही है। वहाँ खड़े दस-बारह लोग बिना कुछ बोले, शून्य में आँखें टिकाए उस राख होती देह को देख रहे हैं। वहाँ एक ऐसा सन्नाटा है जो कानों को फाड़ देने वाली चीख से भी ज्यादा गहरा है।


Burning funeral pyre symbolizing the ultimate truth of life जलती हुई चिता जीवन के अंतिम सत्य का प्रतीक


अब इस दृश्य में एक खौफनाक बदलाव कीजिए कल्पना कीजिए कि उस धधकती चिता पर जो शव लेटा है, वह किसी अजनबी का नहीं, वरन आपका अपना है। आपके फेफड़ों ने हवा को खींचना बंद कर दिया है। जिन आँखों ने सुबह दफ्तर जाने के लिए अलार्म देखा था, वे अब हमेशा के लिए पथरा चुकी हैं, और आपकी चेतना (आत्मा) उस चिता से दस फीट ऊपर हवा में तैरती हुई नीचे झुकी है, और अपनी ही उस लाश को देख रही है जिसे लोग अब आपका 'नाम' नहीं, बल्कि सिर्फ 'बॉडी' कह रहे हैं।

उस आखिरी मोड़ पर खड़े होकर जब आप पीछे मुड़कर अपनी पूरी जिंदगी का हिसाब लगाएंगे, तो आपको क्या दिखाई देगा ? वह स्मार्टफोन जिसके नोटिफिकेशन चेक करते-करते आपने अपनी आँखों की रोशनी कम कर ली? वह बैंक अकाउंट जिसके आंकड़ों को बढ़ाने के लिए आपने अपने बूढ़े माता-पिता के साथ बैठने का वक्त बेच दिया ? वह महंगी गाड़ी जिसे पड़ोसियों को दिखाकर जलने के लिए आपने दिन-रात तनाव झेला ? या वह दफ्तर की फाइल जिसे टेबल पर छोड़कर आप चले आए और कल सुबह आपकी कुर्सी पर कोई और बैठा होगा ?

उस चिता की आग के सामने इन बेजान कागजों और लोहे के टुकड़ों की औकात क्या बचती है ? एक कड़वा सच स्वीकार कीजिए - हम जिंदगी भर एक ऐसी नाव को पूरी ताकत से पतवार मारते रहे, जो किनारे से बंधी ही नहीं थी। हम समंदर में तैरना सीखने से पहले ही उसकी लहरों के भ्रम में डूब गए। हम जिए ही नहीं, हम सिर्फ मरने की तैयारी करते रहे।

दोस्तों, उस अंतिम क्षण में याद आते वे क्षण, जब आपने प्रेम किया, सेवा की, सीखा, समझा और स्वयं को जाना ? यहीं से जीवनमुक्ति की यात्रा आरंभ होती है। 
जीवनमुक्ति का अर्थ संसार छोड़ना नहीं है - इसका अर्थ है संसार में रहते हुए उसके बंधनों से मुक्त हो जाना।

सनातन दर्शन इस मुक्ति के लिए चार प्रमुख मार्ग बताता है - कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और राजयोग। ये चार अलग-अलग रास्ते नहीं हैं अपितु ये एक ही सत्य की ओर जाने वाले चार द्वार हैं

💧कर्मयोग - दफ्तर  के लैपटॉप को  'यज्ञ की वेदी' बना ले | 

काम को साधना मानकर कार्य करता हुआ व्यक्ति Working with complete mindfulness

संसार का सबसे बड़ा मानसिक रोग यह है कि हम मानते हैं कि हमारे रोज़मर्रा के काम हमें बांधते हैं। हम सोमवार की सुबह को एक अभिशाप की तरह देखते हैं और शुक्रवार की शाम का इंतजार किसी कैद से छूटने वाले कैदी की तरह करते हैं। लेकिन सनातन का "कर्मयोग'" कहता है कि बंधन आपके काम में नहीं है, बल्कि उस काम से जुड़ी आपकी अपेक्षा' (Expectation) में है। 

इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझते हैं - कल्पना कीजिए दो सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स की -अमित और विकास । दोनों एक ही प्रोजेक्ट पर दिन-रात एक करके कोडिंग कर रहे हैं। 

अमित का दृष्टिकोण (साधारण मनुष्य) - अमित लगातार सोच रहा है कि इस प्रोजेक्ट के बाद मुझे तगड़ा बोनस मिलेगा, बॉस मेरी तारीफ करेगा, मुझे प्रमोशन मिलेगा। वह काम के हर घंटे में परिणाम का तनाव जी रहा है। 

विकास का दृष्टिकोण (कर्मयोगी) - विकास उस कोड को लिखने की कला से प्रेम करता है। वह स्क्रीन पर चल रही एक-एक लाइन को अपनी पूरी चेतना सौंप चुका है। उसके लिए वह कोडिंग एक साधना है। अचानक रात को सर्वर क्रैश हो जाता है और दोनों की हफ्तों की मेहनत एक सेकंड में डिलीट हो जाती है। अब क्या होगा ?

अमित डिप्रेशन में आ जाएगा, सिर पकड़ कर रोएगा, किस्मत को कोसेगा और एंग्जायटी की गोली खाएगा। लेकिन विकास ? वह एक गहरी सांस लेगा, मुस्कुराएगा, और दोबारा कीबोर्ड पर उंगलियां चलाकर स्क्रैच से कोड लिखना शुरू कर देगा। विकास रोया क्यों नहीं ? 

क्योंकि वह जान चुका है कि उसका आनंद उस कोड को बनाने की प्रक्रिया में था, उसके अंतहीन परिणाम पर नहीं। जब आप फल की जंजीर को काट देते हैं, तो आपका ऑफिस का लैपटॉप भी एक पवित्र मंदिर बन जाता है। तब आप काम नहीं करते, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा आपके माध्यम से काम करने लगती है।


💧ज्ञानयोग -  संसार के इस मंच पर अपना रोल पूरी शिद्दत से निभाये

सिनेमा का पर्दा जीवन का रूपक Life is like a movie screen

ज्ञानयोग कोई किताबी ज्ञान या सूखी दलीलें नहीं है। यह भ्रम की उस मोटी दीवार पर हथौड़ा है जिसे हम 'परमानेंट रियलिटी' मान बैठे हैं। हम जिसे अपनी पक्की जिंदगी कहते हैं - यह सोशल मीडिया का स्टेटस, यह समाज का रुतबा, यह रिश्ते - यह सब बहते पानी पर बने उस बुलबुले की तरह हैं जो अगले ही पल फूटने वाला है।

ज्ञानयोग को समझने के लिए आइए एक पुराने सिनेमा हॉल में चलते हैं -  आप एक अंधेरे, ठंडे थिएटर में बैठे हैं। सामने एक विशाल सफेद पर्दा है। अचानक स्क्रीन पर एक डरावनी हॉरर फिल्म शुरू होती है। पर्दे पर एक भयंकर आग लगती है, गगनचुंबी इमारतें जल रही हैं, लोग चीख रहे हैं, खून बह रहा है। दृश्य इतना असली है कि आपकी छाती धड़कने लगती है, आपके हाथ ठंडे हो जाते हैं और आप डर से अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। लेकिन ठीक उसी पल, आप अपनी गर्दन पीछे घुमाते हैं और ऊपर देखते हैं। आप देखते हैं कि पीछे लगे एक छोटे से प्रोजेक्टर से रोशनी की एक पतली सी किरण निकल रही है और सामने के कपड़े पर गिर रही है।

जैसे ही आपको यह बोध होता है, आपका डर एक ठहाके में बदल जाता है। आप समझ जाते हैं कि सामने स्क्रीन पर चाहे कितनी भी भयानक आग लगी हो, लेकिन उस सफेद कपड़े का एक भी धागा न तो जल रहा है, न गर्म हो रहा है। फिल्म खत्म होगी, लाइटें जलेंगी और पर्दा फिर से वैसा ही कोरा, शांत और अछूता खड़ा रहेगा।

ज्ञानी पुरुष जीवन के इसी 'प्रोजेक्शन' को पकड़ लेता है। वह संसार के इस मंच पर अपना रोल पूरी शिद्दत से निभाता है। वह नुकसान होने पर रोता भी है, जीत पर हंसता भी है, लेकिन अपने भीतर के सबसे गहरे कोने में वह हमेशा जानता है कि वह इस फिल्म का हिस्सा नहीं, बल्कि इसका "द्रष्टा' (Witness) " है। मौत सिर्फ इस शरीर का पर्दा गिराएगी, आपकी आत्मा हमेशा उस सफेद पर्दे की तरह बेदाग रहेगी।


💧भक्तियोग - परम सत्ता के सम्मुख  "मै " को पूर्ण समर्पित कर दे | 

नदी में बहता पत्ता पूर्ण समर्पण का प्रतीक Leaf surrendered to the river

यदि ज्ञान की तलवार आपके तार्किक दिमाग को बहुत ठंडी और सूखी लगती है, तो भक्तियोग के उस मखमली और गहरे दरिया में उतर जाइए, जहाँ खुद को मिटा देना ही सबसे बड़ी जीत है। मनुष्य का हर दुख, हर ईर्ष्या, हर हीनभावना सिर्फ एक ही वायरस से पैदा होती है - मैं' (अहंकार)। मेरा अपमान क्यों हुआ? मेरा बिजनेस क्यों डूबा? मुझे क्रेडिट क्यों नहीं मिला?" इस 'मैं' की लाश को ढोते-ढोते हमारी आत्मा लहूलुहान हो चुकी है। भक्तियोग इस 'मैं' को विसर्जित करने का नाम है।

एक उदाहरण - एक पहाड़ी नदी की कल्पना कीजिए जो तेज़ वेग से पत्थरों को चीरती हुई बह रही है। उस नदी की उफनती लहरों के बीच एक छोटा सा सूखा पत्ता गिरा हुआ है। उस पत्ते की अपनी कोई मोटर नहीं है, कोई स्टेयरिंग नहीं है, कोई जिद नहीं है। नदी उसे जहाँ ले जाती है, वह चुपचाप चला जाता है। जब नदी उसे किसी पत्थर से टकराती है, तो वह पत्ता नदी से लड़ता नहीं है, वह मुड़ जाता है। जब नदी उसे किसी शांत किनारे पर छोड़ देती है, तो वह वहाँ विश्राम करने लगता है। उसने अपना पूरा अस्तित्व उस नदी के प्रवाह को सौंप दिया है।

क्या उस पत्ते को कभी कोई डिप्रेशन हो सकता है? क्या उसे एंग्जायटी हो सकती है? कभी नहीं। क्योंकि अब पत्ते को बचाने या डुबोने की जिम्मेदारी उसकी अपनी नहीं, उस विशाल नदी की है । भक्तियोग यही परम समर्पण है।

 जब आप सुबह उठकर ब्रह्मांड की उस महाचेतना से कहते हैं - "अब मैं अपनी जिंदगी की स्टेयरिंग तेरे हाथ में सौंपता हूँ। तू जहाँ ले जाएगा, मैं चलूँगा। जो परिस्थिति देगा, उसे तेरा प्रसाद मानकर स्वीकार करूँगा।" जब एक छोटी सी बूंद सागर से अलग अपनी पहचान बनाए रखने की जिद छोड़ देती है, तो वह बूंद नहीं रहती, वह खुद महासागर बन जाती है।



💧राजयोग -जब भी समय मिले अपने भीतर उतर जाये | 

CALM AND DEEP BLUE WATER

इन सब रास्तों का जो वैज्ञानिक और ध्यानपरक सिरा है, वह है "'राजयोग'"। हमारा मन एक चौराहे पर लगे उस ट्रैफिक की तरह है जहाँ बिना हॉर्न बजाए गाड़ियां चौबीसों घंटे दौड़ रही हैं। पुरानी यादों का अतीत और अनजाने डर का भविष्य - हमारा मन इसी के बीच झूलता रहता है।

इसे समझने के लिए एक सुंदर उदाहरण  - कल्पना कीजिए एक गहरे तालाब की। हवा चल रही है और पानी की सतह पर लाखों लहरें उठ रही हैं। कुछ लोग किनारे पर खड़े होकर उस तालाब में लगातार पत्थर फेंक रहे हैं, जिससे नीचे बैठी हुई सारी सड़ी-गली मिट्टी, कीचड़ और कचरा ऊपर तैरने लगा है। पानी इतना गंदा और अशांत हो चुका है कि अगर आप झुककर उसमें अपना चेहरा देखना चाहें, तो आपको सिर्फ एक डरावनी, विकृत परछाई दिखेगी।

अब एक चमत्कार होता है। हवाएं थम जाती हैं। पत्थर फेंकने वाले हाथ रुक जाते हैं। तालाब के ऊपर एक आदिम, गहरा सन्नाटा छा जाता है। धीरे-धीरे, पानी की एक-एक लहर शांत होकर विलीन हो जाती है। सतह बिल्कुल एक साफ आईने जैसी स्थिर हो जाती है। और जैसे ही पानी थमता है, सारी मिट्टी नीचे बैठ जाती है और पानी इतना पारदर्शी हो जाता है कि तालाब की अतल गहराई में छिपा हुआ एक चमकीला हीरा साफ दिखाई देने लगता है।

हमारा मन भी वही तालाब है, और वह हीरा हमारी अपनी " आत्मा'" है। ध्यान का मतलब जबरदस्ती आंखें मूंदकर बैठना नहीं है - ध्यान का मतलब है - अपने भीतर उठने वाले विचारों के इन पत्थरों को, इस ट्रैफिक को थाम देने का अभ्यास करना। जब मन की आख़िरी लहर भी शांत हो जाती है, तब जो बचता है, वह है - एक अगाध, दिव्य मौन। जिसने उस मौन का स्वाद चख लिया, वह दुनिया के सबसे बड़े शोर के बीच खड़े होकर भी पूरी तरह शांत रहेगा।



💧जीवनमुक्त का महामंत्र -  कीचड़ के बीच कमल का खिलना-

कीचड़ में खिला कमल जीवनमुक्ति का प्रतीक Lotus blooming above muddy water

तो फिर इस जीवन का अंतिम सत्य क्या है? क्या हमें अपनी गृहस्थी, अपनी दुकानें, अपने परिवार को छोड़कर पहाड़ों की कंदराओं में भाग जाना चाहिए? या इस संसार के दलदल में पूरी तरह डूब जाना चाहिए? सत्य न तो भागने में है और न ही डूबने में। जीवन का सत्य है - "कमल का फूल' बन जाने में।

कमल कीचड़ की सबसे निचली परत से जनम लेता है, गंदे पानी के थपेड़ों के बीच बड़ा होता है, लेकिन जब वह खिलता है, तो उसकी कोमल पंखुड़ियों पर कीचड़ का एक भी दाग, पानी की एक भी बूंद टिक नहीं पाती। वह पानी के ऊपर तैरता है, सूर्य की किरणों से मुस्कुराकर बात करता है और अपनी खुशबू से पूरे माहौल को महका देता है।

मोक्ष मरने के बाद मिलने वाला कोई सर्टिफिकेट नहीं है। मोक्ष तो इसी क्षण, इसी सांस में छुपी हुई आपकी चेतना की एक जागृत अवस्था है। संसार में रहिए, अपनी हर जिम्मेदारी को इस तरह निभाइए जैसे कोई अभिनेता स्टेज पर अपना रोल निभाता है - पूरी शिद्दत से, लेकिन यह जानते हुए कि नाटक खत्म होने के बाद उसे अपने असली घर लौट जाना है।

याद रखिए, जो सांस आपके भीतर गई है, वह लौटकर आएगी या नहीं, इसका कोई वादा इस कायनात ने आपसे नहीं किया है। समय की रेत बहुत तेजी से हाथ से फिसल रही है। तो फिर इस क्षणभंगुर संसार के झूठे बंधनों और छोटी-छोटी शिकायतों में अपनी सांसों को कब तक सुलगाते रहेंगे ?

दोस्तों , उठिए, अपने भीतर के उस अनंत समंदर को पहचानिए और इसी वक्त आजाद हो जाइए। क्योंकि लहरों को तो किनारे पर आकर टूटना ही होता है, पर समंदर कभी नहीं मरता। आप लहर नहीं, स्वयं समंदर हैं ! अपने भीतर के इस साक्षी भाव को थामे रखिए। शांत रहिए, सजग रहिए।

WITHRBANSAL

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