ईश्वर आपको कष्ट क्यों देता है ? संघर्ष का वह रहस्य जो आपकी पूरी सोच बदल देगा |

withrbansal

         क्या वाकई मे जीवन मे आने वाली समस्याएं हमें तोड़ती है ? 

 दोस्तों, उस दिन नदी के किनारे लौटते समय हवा पहले जैसी ही थी, पानी पहले जैसा ही बह रहा था, पक्षी पहले जैसे ही गा रहे थे। बदल गया था तो केवल मेरा दृष्टिकोण। मेरे भीतर एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था - यदि जीवन का उद्देश्य स्वयं को गढ़ना है, तो फिर जीवन में इतना संघर्ष क्यों है? 

यदि आपने इस श्रंखला का पहला भाग नहीं पढ़ा है तो पहले यह अवश्य पढ़े - जब सब कुछ बदल रहा हो, तब आपको क्या गढ़ना चाहिए ?

Symbol of hope after life's struggleसंघर्ष के बाद उगती नई आशा का प्रतीक


क्यों कोई व्यक्ति जन्म से ही अभावों में पलता है, जबकि किसी के पास सब कुछ होता है ? क्यों किसी का हृदय प्रेम में टूटता है, किसी का शरीर बीमारी से, किसी का आत्मविश्वास असफलताओं से और किसी का मन अकेलेपन से ?यदि ईश्वर करुणामय है, यदि प्रकृति हमारी मित्र है, तो फिर जीवन हमें इतनी कठिन राहों से क्यों गुज़ारता है?

यह प्रश्न केवल मेरा नहीं है, यह हर एक उस मनुष्य का प्रश्न है जिसने कभी जीवन में आँसू बहाए हैं। वर्षों तक मैंने इसका उत्तर पुस्तकों में खोजा। उपनिषदों को पढ़ा, श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों पर मनन किया, बुद्ध के उपदेश सुने, महावीर की वाणी पढ़ी, आधुनिक मनोवैज्ञानिकों को समझा और सफल लोगों की जीवन यात्राओं का अध्ययन किया। हर किसी ने अलग भाषा में उत्तर दिया, पर सार एक ही था - जीवन हमें तोड़ने नहीं, गढ़ने आता है। और यह सत्य मुझे सबसे पहले किसी गुरु ने नहीं, बल्कि प्रकृति ने सिखाया।



बाँस की गहरी जड़ें और विकासDeep roots of bamboo representing hidden growth


प्रकृति मे इसका सबसे अच्छा उदाहरण बांस का पेड़ है l क्या आपने कभी बाँस का पौधा उगते देखा है? जब उसका बीज मिट्टी में डाला जाता है, तब पहले वर्ष खेत लगभग वैसा ही दिखाई देता है। दूसरे वर्ष भी कुछ विशेष नहीं बदलता, तीसरे वर्ष भी नहीं, कई बार चौथे वर्ष तक भी ऐसा लगता है कि मानो कुछ हुआ ही नहीं। यदि कोई अधीर किसान हो, तो वह कह सकता है - "यह बीज बेकार था।" लेकिन प्रकृति मुस्कुरा रही होती है। क्योंकि उसे पता है कि इस समय बाँस ऊपर नहीं, नीचे बढ़ रहा है।

धरती के भीतर वह अपनी जड़ों का विशाल संसार बना रहा है। वह ऐसी नींव तैयार कर रहा है जो आने वाले वर्षों में उसकी ऊँचाई को संभाल सके। फिर एक समय आता है जब वही बाँस कुछ ही महीनों में कई फीट ऊपर उठ जाता है l दुनिया कहती है - "वाह! रातों-रात सफलता मिल गई।" लेकिन सत्य यह है कि कोई भी महान उपलब्धि रातों-रात नहीं मिलती। जो दिखाई देता है, वह केवल परिणाम होता है। वास्तविक विकास तो वर्षों पहले शुरू हो चुका होता है।

क्या हमारे जीवन में भी ऐसा होता है ? बिलकुल, जब आप पूरी ईमानदारी से कार्य करते हैं और वर्षों तक किसी को आपकी मेहनत दिखाई नहीं देती...जब आप अपने चरित्र को सँवार रहे होते हैं, लेकिन लोग केवल आपकी कमियाँ देखते हैं... जब आप सत्य का मार्ग चुनते हैं और झूठ बोलने वाले आपसे आगे निकलते दिखाई देते हैं... तब मन में निराशा आना स्वाभाविक है। लेकिन सम्भव है कि उसी समय आपका जीवन अपनी जड़ें मजबूत कर रहा हो।

प्रकृति का नियम है - ऊँचाई से पहले गहराई। जिस वृक्ष की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, आँधियाँ उसे उतना ही कम हिला पाती हैं। इसी प्रकार जिस मनुष्य का चरित्र जितना गहरा होता है, परिस्थितियाँ उसे उतना ही कम तोड़ पाती हैं।



कोकून से बाहर निकलती तितलीButterfly emerging from chrysalis


इस बारे मे एक प्रसिद्ध कथा है। एक वैज्ञानिक ने देखा कि एक तितली अपने कोकून से बाहर निकलने का प्रयास कर रही है।वह घंटों संघर्ष करती रही। वैज्ञानिक को उस पर दया आ गई।उसने कैंची से कोकून थोड़ा काट दिया, तितली आसानी से बाहर आ गई। लेकिन उसके पंख कभी मजबूत नहीं बन पाए ,वह जीवन भर उड़ नहीं सकी। क्यों? क्योंकि प्रकृति ने उस संघर्ष को ही उसके पंखों की शक्ति बनाया था। जिस कठिनाई को वैज्ञानिक ने हटाया, उसी कठिनाई में उसकी उड़ान छिपी हुई थी।

कभी-कभी हमारी सबसे बड़ी दया भी किसी की सबसे बड़ी हानि बन सकती है।

💚 इंसान संघर्ष से इतना भागता क्यों हैं ?

क्योंकि हमारा मन सुख चाहता है। वह चाहता है कि कोई आलोचना न करे, कोई असफलता न मिले, कोई प्रतीक्षा न करनी पड़े। सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार होता रहे। लेकिन क्या ऐसा जीवन सम्भव है ? और यदि सम्भव हो भी जाए... तो क्या वह हमें विकसित कर पाएगा ? जिस जीवन में चुनौतियाँ नहीं होतीं, वहाँ व्यक्तित्व भी नहीं निखरता। नदी यदि बहना छोड़ दे तो वह झील बन जाती है l इसी प्रकार मनुष्य यदि संघर्ष छोड़ दे तो वह भी ठहर जाता है।
 

💚जीवन एक कुशल सुनार है - 

Gold being refined in fireआग में तपता हुआ सोना

जब सुनार सोने को भट्टी में रखता है, तो उसका उद्देश्य उसे नष्ट करना नहीं होता। वह उसे अधिक शुद्ध, अधिक चमकदार और अधिक मूल्यवान बनाना चाहता है। आग उसके लिए शत्रु नहीं होती। वह उसकी परिष्कार की प्रक्रिया होती है। जीवन भी ऐसा ही सुनार है। उसकी भट्टी में कभी आर्थिक कठिनाई आती है, कभी बीमारी, कभी अपमान, कभी असफलता। इन घटनाओं का उद्देश्य हमेशा हमें दंड देना नहीं होता। वे हमारे भीतर छिपी अशुद्धियों को सामने लाती हैं - अहंकार, भय, लोभ, क्रोध, अधीरता , स्वार्थ इत्यादि l  जब तक वे भीतर छिपे रहते हैं, हम स्वयं को पूर्ण समझते रहते हैं। संघर्ष उन्हें हमारे सामने ला देता है और तभी परिवर्तन की यात्रा आरम्भ होती है।

💚आध्यात्मिक दृष्टि से संघर्ष - 

आध्यात्मिक परम्पराएँ कहती हैं कि मनुष्य केवल शरीर नहीं है।वह एक चेतना है, जो अनुभवों के माध्यम से परिपक्व होती है। यदि शरीर की मांसपेशियाँ व्यायाम से मजबूत होती हैं, तो आत्मा का धैर्य संघर्ष से मजबूत होता है। जिस प्रकार बीज का आवरण टूटे बिना अंकुर बाहर नहीं आता, उसी प्रकार अहंकार का आवरण टूटे बिना आत्मा का प्रकाश प्रकट नहीं होता। कभी-कभी ईश्वर हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर हमारी इच्छानुसार नहीं देता। वह हमें परिस्थितियाँ देता है। क्योंकि परिस्थितियाँ हमें वह बना देती हैं, जो केवल सुविधाएँ कभी नहीं बना सकतीं।


💚संघर्ष का सबसे बड़ा उपहार - 

संघर्ष हमें दो महान उपहार देता है। पहला - वह हमें हमारी सीमाओं से परिचित कराता है। दूसरा - वह हमें हमारी छिपी हुई शक्तियों से मिलाता है। किसी को अपने साहस का पता युद्ध में चलता है। किसी को अपने धैर्य का पता लंबी प्रतीक्षा में चलता है। किसी को अपनी करुणा का पता तब चलता है जब वह स्वयं पीड़ा से गुजरता है। किसी को अपनी आस्था का पता तब चलता है जब उसके पास कोई सहारा नहीं बचता। यदि जीवन हमेशा आसान रहता...तो शायद हम स्वयं को कभी जान ही नहीं पाते।


 हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम जीवन से पूछते हैं - "मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?" लेकिन शायद सही प्रश्न यह है - "यह अनुभव मुझे क्या सिखाने आया है?" पहला प्रश्न हमें पीड़ित बनाता है। दूसरा प्रश्न हमें साधक बना देता है। जब दृष्टि बदलती है, तब वही घटना जो पहले अभिशाप लगती थी, बाद में वरदान बन जाती है।

संघर्ष जीवन का विरोध नहीं है। संघर्ष वह छेनी है जिससे जीवन हमारे व्यक्तित्व की मूर्ति गढ़ता है।

एक प्रयोग करें - आज कुछ देर अकेले बैठिए। अपनी आँखें बंद कीजिए। अपने जीवन की सबसे कठिन घटना को याद कीजिए। अब स्वयं से तीन प्रश्न पूछिए l पहला - उस घटना ने मुझसे क्या छीन लिया ? दूसरा - उसने मुझे क्या सिखाया?  तीसरा -  यदि वह घटना न होती, तो क्या मैं आज का वही व्यक्ति होता? इन तीन प्रश्नों के उत्तर आपकी पूरी जीवन-दृष्टि बदल सकते हैं

Person meditating at sunrise


दोस्तों ,उस रात मैंने डायरी मे नोट किया -  "मैं अब जीवन से यह नहीं पूछूँगा कि मेरे साथ यह क्यों हुआ। मैं यह पूछूँगा कि यह मुझे क्या बनाना चाहता है।" उसी क्षण मुझे लगा कि शायद यहीं से मनुष्य का वास्तविक जन्म होता है। वह परिस्थितियों का शिकार होना छोड़ देता है, वह शिकायत करना छोड़ देता है। वह दूसरों को दोष देना छोड़ देता है और पहली बार अपने जीवन की छेनी स्वयं अपने हाथ में उठा लेता है। क्योंकि अंततः जीवन का उद्देश्य केवल सुखी होना नहीं है।

जीवन का उद्देश्य ऐसा व्यक्तित्व बनना है, जो सुख में विनम्र रहे, दुःख में अडिग रहे, सफलता में संयमित रहे और असफलता में भी आशा का दीप जलाए रखे। यही संघर्ष की साधना है, यही आत्म-विकास का मार्ग है और शायद... यही जीवन का सबसे सुंदर रहस्य भी है।
Withrbansal 

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