धन, घर और सफलता सब मिल जाएँ... फिर भी लोग दुखी क्यों रहते हैं ?

withrbansal

जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि - आपने कितना पाया नहीं, बल्कि आप क्या बन गए !

A person reflecting on the purpose of life beside a peaceful river at sunset


दोस्तों, मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह सोचता है - 'बस यह मिल जाए, फिर मैं खुश हो जाऊँगा।' लेकिन जीवन का सबसे बड़ा सत्य यह है कि खुशी पाने से नहीं, बनने से आती है।" क्या हम सचमुच जी रहे हैं या केवल पाने की दौड़ में हैं ?

कुछ दिन पहले शाम को नदी किनारे टहलते हुए मेरे मन में एक प्रश्न उठा - हम जीवन भर आखिर किसके पीछे भागते रहते हैं ? बचपन में अच्छे अंक चाहिए थे , फिर अच्छी नौकरी, उसके बाद अपना घर ,फिर बड़ा घर,बच्चों का भविष्य,सम्मान,पैसा, सुरक्षा। घर लौटकर मैंने अपनी वर्षों पुरानी डायरी खोली। हर पन्ने पर कोई-न-कोई लक्ष्य लिखा था - "प्रथम आना है..." "सरकारी नौकरी चाहिए..." "अपना घर बनाना है..." "आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना है..." इत्यादि | 

 लेकिन सबसे बड़ी बात जिसने मुझे  झकझोर दिया कि  पूरी डायरी में कहीं भी यह नहीं लिखा था - "मुझे अधिक धैर्यवान बनना है।" "मुझे ऐसा इंसान बनना है जिस पर लोग भरोसा कर सकें।" "मुझे अपने क्रोध पर विजय पानी है।" "मुझे ऐसा हृदय बनाना है जिसमें किसी के लिए कटुता न हो।" तभी समझ आया कि हम अपने भविष्य की योजना तो बनाते हैं, लेकिन अपने व्यक्तित्व की योजना शायद ही कभी बनाते हैं।

A person writing life goals in a personal diary


 दोस्तों, यदि आज आपको सब कुछ मिल जाए तो ? एक क्षण के लिए कल्पना कीजिए - आज सुबह उठते ही आपके बैंक खाते में असीम धन आ जाए, आपके पास बड़ा घर हो, समाज में प्रतिष्ठा हो, लोग आपकी प्रशंसा करें, क्या उसके बाद जीवन में कोई संघर्ष नहीं रहेगा ? शायद नहीं। क्योंकि संघर्ष केवल परिस्थितियों का नहीं होता, बल्कि मन की अवस्था का होता है।

अशांत मन महलों में भी बेचैन रहता है। संतुष्ट मन छोटी-सी झोपड़ी में भी मुस्कुरा लेता है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ अपार संपत्ति रखने वाले लोग भीतर से टूटे हुए थे, और सीमित साधनों वाले लोग अद्भुत शांति के साथ जीवन जी रहे थे। फर्क धन का नहीं था ,फर्क उनके व्यक्तित्व का था।


💧 बाहरी ख़ुशी अस्थायी होती है - 

हम बचपन से एक ही वाक्य सुनते और दोहराते हैं - "जब यह मिल जाएगा, तब मैं खुश हो जाऊँगा ।" लेकिन क्या सचमुच ऐसा होता है ? नई कार कुछ महीनों बाद सामान्य लगने लगती है । नई नौकरी भी धीरे-धीरे दिनचर्या बन जाती है। नई उपलब्धि कुछ समय बाद केवल एक याद रह जाती है। इसे आधुनिक मनोविज्ञान "हेडोनिक एडाप्टेशन" कहता है अर्थात मनुष्य नई उपलब्धियों का जल्दी अभ्यस्त हो जाता है। इसलिए बाहरी सफलता केवल क्षणिक उत्साह देती है। स्थायी संतोष हमारे भीतर विकसित गुणों से आता है।

💧 हर व्यक्ति दो यात्राएँ करता है -

Two different paths representing success and self-growth

जीवन में हम सभी एक साथ दो यात्राएँ कर रहे होते हैं। पहली यात्रा बाहर की है - धन कमाना...करियर बनाना...परिवार बसाना...सपनों को पूरा करना...इत्यादि l दूसरी यात्रा भीतर की है - धैर्य सीखना, सत्य का पालन करना, अनुशासन विकसित करना, करुणा और प्रेम बढ़ाना, अधिक जागरूक बनना आदि l  समस्या तब शुरू होती है जब पूरी ऊर्जा पहली यात्रा में लग जाती है और दूसरी यात्रा अधूरी रह जाती है। बाहर शानदार मकान बन जाता है लेकिन भीतर का घर खाली रह जाता है।

जब आप किसी आम के पेड़ को देखते हैं तो सबसे पहले क्या दिखाई देता है -  फल, हरी शाखाएँ, घनी छाया। लेकिन क्या कभी किसी ने उसकी जड़ों की प्रशंसा की ? जड़ें दिखाई नहीं देतीं फिर भी पूरा वृक्ष उन्हीं पर खड़ा रहता है। मनुष्य भी बिल्कुल ऐसा ही है। आपकी उपलब्धियाँ आपकी शाखाएँ हैं।आपका व्यक्तित्व आपकी जड़ है। यदि जड़ें मजबूत हैं तो जीवन के तूफान भी आपको नहीं गिरा पाएँगे। यदि जड़ें कमजोर हैं तो छोटी-सी विपत्ति भी आपको तोड़ सकती है। इसलिए बुद्धिमान लोग शाखाओं से पहले जड़ों को सींचते हैं।

A large tree with deep roots symbolizing strong character



💧सफलता का असली विज्ञान - 

अधिकांश लोग सफलता को लक्ष्य बनाते हैं लेकिन सफलता कभी सीधे हाथ नहीं आती। वह छाया की तरह है। यदि आप सूर्य की ओर चलेंगे तो छाया स्वयं पीछे आएगी। यदि छाया को पकड़ने दौड़ेंगे तो वह हमेशा दूर भागेगी। सफलता भी ठीक ऐसी ही है। जब आप प्रतिदिन स्वयं को बेहतर बनाते हैं... जब आप ईमानदारी नहीं छोड़ते... जब आप समय का सम्मान करते हैं...जब आप सीखना जारी रखते हैं...जब कठिन परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों से समझौता नहीं करते...तब सफलता धीरे-धीरे आपके जीवन का परिणाम बन जाती है।


💧एक सवाल जो हर व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए - 

यदि आज आपकी सारी उपलब्धियाँ छिन जाएँ - तो क्या आपके पास ऐसा व्यक्तित्व बचा रहेगा जो आपको फिर से खड़ा कर सके ? यदि उत्तर "हाँ" है - तो आपने सही निवेश किया है l यदि उत्तर "नहीं" है - तो अभी भी समय है। एक काम करे - आज ही अपनी डायरी में दो सूचियाँ लिखिए। पहली सूची लिखे - अगले पाँच वर्षों में मैं क्या-क्या पाना चाहता हूँ ? दूसरी सूची में - अगले पाँच वर्षों में मैं कैसा मनुष्य बनना चाहता हूँ ? 
                                                                                             अब दोनों सूचियों की तुलना कीजिए। यदि पहली सूची लंबी है और दूसरी छोटी है तो समझिए कि आपकी यात्रा अभी अधूरी है। क्योंकि जीवन का वास्तविक मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि आपने कितना अर्जित किया, बल्कि इस बात से तय होता है कि उस यात्रा ने आपको कैसा इंसान बनाया है l 

"सफलता का पीछा मत कीजिए। स्वयं को इतना श्रेष्ठ बनाइए कि सफलता आपके पीछे चलने लगे।"

उस रात मैंने अपनी डायरी का एक नया पन्ना खोला। इस बार मैंने कोई नई कार, नया घर या नई उपलब्धि नहीं लिखी। मैंने केवल एक वाक्य लिखा - "आज से मैं अपनी परिस्थितियों से अधिक अपने व्यक्तित्व पर काम करूँगा।" उस एक वाक्य ने मेरी सोच बदल दी। शायद यही एक वाक्य आपके जीवन की दिशा भी बदल दे।

A person writing a new life commitment in a diary at night


याद रखिए - जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि आपने कितना पाया। जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उस पूरी यात्रा में आप क्या बन गए।
withrbansal

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