जब लगे कि जीवन में कोई रास्ता नहीं बचा… तब रुकिए: कहानी अभी खत्म नहीं हुई है |
withrbansal आत्महत्या क्यों ? जब जीवन असहनीय लगे तब यह लेख जरूर पढ़ें
आत्महत्या क्यों ? जब जीवन असहनीय लगे तब यह लेख जरूर पढ़ें
Suicide के Spiritual और Practical Aspects - शायद यह लेख किसी एक जिंदगी को बचा दे
“कभी-कभी इंसान जिंदगी ख़त्म नहीं करना चाहता… वह केवल उस दर्द से मुक्त होना चाहता है जिसे वह और सहन नहीं कर पा रहा।” शायद आत्महत्या को समझने की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए। अगर आज आपको भी लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है, तो बस एक पल रुकिए… हो सकता है आपकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत अध्याय अभी लिखा ही न गया हो। याद रखिए - एक कठिन परिस्थिति पूरी जिंदगी का फैसला नहीं होती। कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
🚨 यदि आप अभी तत्काल खतरे में हैं -
दोस्त , यदि आपके मन में अभी आत्महत्या करने या स्वयं को नुकसान पहुँचाने का विचार आ रहा है, तो अभी कोई अंतिम निर्णय न लें और अकेले न रहें और - तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताइए कि - “ मेरे मन में आत्महत्या के विचार आ रहे हैं, कृपया मेरे साथ रहें।”.... ऐसी जगह या वस्तुओं से दूर हो जाइए जिनसे आप स्वयं को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
@ भारत में Tele-MANAS: 14416 या 1800-89-14416 अथवा 1800-599-0019 पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए संपर्क करें। गैर -सरकारी संगठन "आसरा" (AASRA) नंबर - +91- 9999666555 अथवा iCALL के नंबर - +91- 9152987821 पर संपर्क कर सहायता ले सकते है |
@ यदि आपको लगता है कि आप अभी स्वयं को नुकसान पहुँचा सकते हैं, तो नजदीकी अस्पताल की Emergency में जाएँ या 112 पर तत्काल सहायता लें।
@ संभव हो तो किसी परिवारजन अथवा मित्र को तत्काल फोन लगाकर अपने पास बुलाये या किसी भी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के पास जाकर उन्हें अपनी समस्या बताये |
@ आपको अभी पूरी जिंदगी का समाधान नहीं करना है। अभी केवल अगले कुछ घंटे सुरक्षित निकालने हैं। मदद माँगना कमजोरी नहीं, जीवन की रक्षा की दिशा में पहला साहसिक कदम है।
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दोस्तों, आज जब कोटा जैसे शहरों में पढ़ाई और भविष्य के दबाव से जूझ रहे युवाओं एवं अन्य क्षेत्रो मे कार्यरत व्यक्तियों की आत्महत्या की खबरें सामने आती हैं, तो पूरा समाज कुछ दिनों के लिए बेचैन हो जाता है। इससे पहले फिल्म और टेलीविजन जगत की अनेक चर्चित हस्तियों की आत्महत्याओं ने भी देश को झकझोर दिया। लेकिन आत्महत्या किसी एक शहर, वर्ग, धर्म, जाति, व्यवसाय या उम्र की समस्या नहीं है। यह एक ऐसी मानवीय त्रासदी है जो किसी भी घर के दरवाजे तक पहुँच सकती है।
WHO के अनुसार हर वर्ष दुनिया में 7.2 लाख से अधिक लोग आत्महत्या से मरते हैं और आत्महत्या 15–29 वर्ष के युवाओं में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। WHO यह भी स्पष्ट करता है कि आत्महत्या रोकथाम योग्य है और अनेक आत्महत्याएँ ऐसे संकटपूर्ण क्षणों में होती हैं जब व्यक्ति की समस्या से निपटने की क्षमता अस्थायी रूप से टूट जाती है।
इसलिए हमें आत्महत्या को केवल “एक व्यक्ति ने अपनी जान ले ली” के रूप में नहीं देखना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि उस क्षण उसके मन में ऐसा क्या चल रहा था कि उसे जीवन के सारे दरवाजे बंद और मृत्यु का दरवाजा खुला दिखाई देने लगा?
💧आत्महत्या वास्तव में क्या है ?
सामान्य दृष्टि से आत्महत्या को जीवन समाप्त करने का निर्णय माना जाता है। लेकिन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से कई बार व्यक्ति वास्तव में जीवन समाप्त नहीं करना चाहता.....वह अपनी पीड़ा, असफलता, अपमान, अकेलेपन, निराशा या मानसिक संघर्ष को समाप्त करना चाहता है। समस्या यह है कि संकट के चरम क्षण में मस्तिष्क व्यक्ति को उपलब्ध विकल्पों को देखने की क्षमता सीमित कर सकता है।
उसे लगता है - “अब कुछ नहीं बदल सकता।” “मेरे लिए कोई रास्ता नहीं बचा।” “सब खत्म हो गया।” “मेरे बिना सब बेहतर रहेंगे।” यही वह खतरनाक भ्रम है जिसे पहचानना आवश्यक है। क्योंकि परिस्थिति अंतिम नहीं होती, लेकिन संकट के क्षण में मन उसे अंतिम समझ लेता है।
आज जो असफलता है, वह कुछ वर्षों बाद कहानी बन सकती है। आज जो आर्थिक संकट है, वह कल समाप्त हो सकता है , आज जिस व्यक्ति से बिछड़ना असहनीय लग रहा है, उसके बिना भी जीवन आगे बढ़ सकता है, आज जिस परीक्षा में असफलता मिली है, वह पूरे जीवन की परीक्षा का परिणाम नहीं है। एक परीक्षा में असफल होना और जीवन में असफल होना - दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
💧आखिर आत्महत्या के पीछे कौन-से कारण होते हैं ?
आर्थिक समस्या, बेरोजगारी, कर्ज, पारिवारिक विवाद, प्रेम संबंध, परीक्षा का दबाव, करियर की असफलता, बीमारी, कार्यस्थल का तनाव, सामाजिक अपमान, अकेलापन, अपराधबोध, नशा, अवसाद और मानसिक बीमारी जैसे अनेक कारण व्यक्ति को संकट में डाल सकते हैं। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि घटना अक्सर कारण नहीं होती , घटना के प्रति व्यक्ति की मानसिक प्रतिक्रिया संकट को जन्म देती है। एक ही परिस्थिति में दो लोग अलग-अलग प्रतिक्रिया क्यों देते हैं? क्योंकि समस्या केवल बाहर नहीं होती।
अर्थात
समस्या + मन की स्थिति + परिस्थितियों से निपटने की क्षमता = संकट की तीव्रता
इसीलिए आत्महत्या रोकने के लिए केवल परिस्थितियाँ बदलना पर्याप्त नहीं है। हमें मनुष्य को यह भी सिखाना होगा कि कठिन परिस्थितियों के साथ कैसे जिया जाए।
💧सबसे खतरनाक भ्रम - “अब कोई रास्ता नहीं है”
आत्महत्या के विचार में फँसे व्यक्ति के सामने सबसे बड़ी समस्या अक्सर समस्या नहीं होती। समस्या होती है - उसे विकल्प दिखाई देना बंद हो जाते हैं। वह वर्तमान दर्द को भविष्य का स्थायी सत्य समझने लगता है। लेकिन जीवन का एक अद्भुत नियम है- “जो परिस्थिति आज स्थायी दिखाई देती है, वह अक्सर अस्थायी होती है।” अंधेरी रात हमेशा नहीं रहती, भावनाएँ हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं, मानसिक संकट हमेशा एक जैसा नहीं रहता। और सबसे महत्वपूर्ण - आज का आपका मन, आपके पूरे भविष्य का निर्णय लेने के लिए आवश्यक रूप से सही अवस्था में नहीं है।
इसलिए यदि मन आत्महत्या की ओर जा रहा है तो उस समय जीवन के बारे में कोई अंतिम निर्णय मत लीजिए....निर्णय टाल दीजिए..... मदद लीजिए..... किसी के पास बैठिए.... डॉक्टर से मिलिए और बस समय को गुजरने दीजिए। क्योंकि कई बार जीवन बचाने के लिए पूरी जिंदगी का समाधान नहीं चाहिए होता....केवल अगला घंटा सुरक्षित निकालना होता है।
💧क्या आत्महत्या के संकेत पहले दिखाई देते हैं ?
हर व्यक्ति में संकेत समान नहीं होते और कोई भी एक संकेत यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति आत्महत्या करेगा। फिर भी कुछ चेतावनी संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए - अचानक लोगों से दूरी बनाना - अत्यधिक निराशा या निरर्थकता की बातें करना - “मेरे जीने का कोई मतलब नहीं”, “मेरे बाद किसी को फर्क नहीं पड़ेगा” जैसी बातें - अचानक व्यवहार में बड़ा परिवर्तन - अत्यधिक भावनात्मक उतार-चढ़ाव - नशे का बढ़ना - अपनी महत्वपूर्ण वस्तुएँ बाँटना - असामान्य विदाई जैसी बातें - मृत्यु के बारे में बार-बार बात करना - आत्महत्या को समस्या का समाधान बताना - पहले आत्महत्या का प्रयास कर चुका होना इत्यादि l
WHO भी सामाजिक अलगाव, गंभीर भावनात्मक संकट, निराशा, जीवन समाप्त करने की बातें, विदाई और मूल्यवान वस्तुएँ देने जैसे संकेतों को गंभीरता से लेने की सलाह देता है। इसलिए किसी के व्यवहार में अचानक बदलाव देखकर यह मत कहिए - “यह तो केवल ध्यान आकर्षित कर रहा है।” हो सकता है वह वास्तव में सहायता के लिए संकेत दे रहा हो।
एक बहुत जरूरी बात - आत्महत्या की बात करने वाले को डाँटें नहीं l यदि आपका कोई अपना कहता है - “मैं जीना नहीं चाहता।” तो तुरंत यह मत कहिए - “तुम्हें क्या कमी है?” “हमने तुम्हारे लिए इतना किया।” “तुम इतने कमजोर कैसे हो सकते हो?” “लोग क्या कहेंगे?” “भगवान ने जीवन दिया है, ऐसा सोचना पाप है।” ये बातें व्यक्ति को और अकेला कर सकती हैं।
इसके बजाय उसके पास बैठिए और कहिए - “मैं तुम्हारी बात सुनना चाहता हूँ।” “तुम अकेले नहीं हो।” “हम अभी कोई अंतिम फैसला नहीं करेंगे।” “चलो, मिलकर मदद लेते हैं।” और यदि आपको लगे कि वह तत्काल स्वयं को नुकसान पहुँचा सकता है, तो उसे अकेला न छोड़ें और तत्काल परिवार, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या आपातकालीन सहायता से संपर्क करें। WHO भी ऐसे मामलों में व्यक्ति को अकेला न छोड़ने और संकट-सेवा/स्वास्थ्यकर्मी से तत्काल सहायता लेने की सलाह देता है।
💧आत्महत्या के आध्यात्मिक आयाम -
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा मनुष्य को केवल शरीर नहीं मानती। हम शरीर में रहने वाली चेतना हैं। शरीर बदलता है ,मन बदलता है , परिस्थितियाँ बदलती हैं , रिश्ते बदलते हैं लेकिन हमारे भीतर कुछ ऐसा है जिसे हम “मैं” कहते हैं - वही चेतना, वही आत्मिक सत्ता, जिसे आध्यात्मिक परंपराएँ शरीर से परे मानती हैं। इस दृष्टि से जीवन केवल जन्म से मृत्यु तक की घटनाओं का नाम नहीं है। यह एक यात्रा है और यात्रा में कठिन रास्ते भी आते हैं।
💧क्या कठिनाइयाँ भी हमारे जीवन का हिस्सा हैं ?
आध्यात्मिक दृष्टि में एक विचार यह है कि जीवन केवल सुख प्राप्त करने के लिए नहीं मिला है। जीवन हमें अनुभव देता है, रिश्ते हमें प्रेम सिखाते हैं, वियोग हमें अनासक्ति सिखाता है, असफलता हमें अहंकार से बाहर निकाल सकती है, कठिनाई हमें धैर्य सिखा सकती है, बीमारी हमें शरीर की सीमाएँ समझा सकती है, अकेलापन हमें स्वयं से मिलने का अवसर दे सकता है और कभी-कभी वही परिस्थिति जिसे हम “दुर्भाग्य” समझते हैं, आगे चलकर हमारे व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है।
इसलिए आध्यात्मिक दृष्टि से एक प्रश्न पूछा जा सकता है - “यह मेरे साथ क्यों हो रहा है ?” के स्थान पर “यह मुझे क्या सिखाने आया है ?” यह प्रश्न हमारी मानसिक दिशा बदल सकता है।
लेकिन एक सावधानी यह है कि - इस आध्यात्मिक विचार का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि व्यक्ति अपने कष्ट को चुपचाप सहता रहे। आध्यात्मिकता, चिकित्सा का विकल्प नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को गंभीर अवसाद है, लगातार आत्महत्या के विचार आते हैं, नींद और भोजन में बड़ा बदलाव है, या वह स्वयं को नुकसान पहुँचाने के बारे में सोच रहा है, तो मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक या अन्य योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लेना आध्यात्मिकता के विरुद्ध नहीं है। बल्कि सहायता स्वीकार करना भी जीवन के प्रति जिम्मेदारी है।
जिस प्रकार शरीर बीमार होने पर डॉक्टर के पास जाते हैं, उसी प्रकार मन और मस्तिष्क संकट में हों तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के पास जाना भी उतना ही सामान्य होना चाहिए।
💧क्या हमारा जीवन किसी उद्देश्य के लिए है ?
यह प्रश्न अत्यंत गहरा है। यदि आप आध्यात्मिक दृष्टि स्वीकार करते हैं तो जीवन को एक अवसर की तरह देखा जा सकता है। हम यहाँ केवल पैसा कमाने, परीक्षा पास करने, नौकरी पाने, मकान बनाने या समाज से प्रशंसा प्राप्त करने के लिए नहीं आए है।शायद हमारा इस धरती पर आने का एक बड़ा उद्देश्य है और वह है - सीखना...प्रेम करना....दूसरों के जीवन को बेहतर बनाना....अपने भीतर की चेतना को विकसित करना और उन अनुभवों से गुजरना जिनसे हमारा व्यक्तित्व अधिक परिपक्व बनता है।
हालांकि हम निश्चित रूप से यह दावा नहीं कर सकते कि प्रत्येक व्यक्ति ने जन्म से पहले अपनी सभी परिस्थितियाँ स्वयं चुनी थीं। लेकिन यह एक सुस्थापित आध्यात्मिक मान्यता है l और इस विचार का एक अत्यंत उपयोगी पक्ष है यह है कि यदि मैं अपनी वर्तमान परिस्थिति को केवल सजा नहीं बल्कि सीखने का अवसर मानूँ, तो मेरी प्रतिक्रिया बदल सकती है। और शायद यही आध्यात्मिकता की व्यावहारिक शक्ति भी है।
कल्पना कीजिए कि कोई विद्यार्थी कठिन परीक्षा के बीच से निकलकर कहे कि - “मुझसे नहीं हो रहा, इसलिए मैं पूरी पढ़ाई ही समाप्त कर देता हूँ।” क्या वह परीक्षा का वास्तविक परिणाम जान पाएगा ? नहीं ना |
इसी तरह जीवन की वर्तमान कठिन परिस्थिति पूरे जीवन का अंतिम परिणाम नहीं है। आप अभी जिस अध्याय में हैं, वह पूरी पुस्तक नहीं है। आज का अध्याय दुखद हो सकता है , अगला अध्याय बिल्कुल अलग हो सकता है। इसलिए जीवन की किताब का अंतिम पृष्ठ उस समय मत लिखिए जब आप सबसे कठिन अध्याय पढ़ रहे हों।
💧 जीवन वास्तव में आत्मा की यात्रा है?
यदि हम इस आध्यात्मिक संभावना को स्वीकार करें कि जीवन आत्मा की विकास-यात्रा है, तो कठिनाइयों से भागने के बजाय उनसे सीखने का दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है। लेकिन यहाँ भी हमें किसी आत्महत्या करने वाले व्यक्ति को दोषी या बेबकुफ़ कहकर उसकी पीड़ा को छोटा नहीं करना चाहिए। वह व्यक्ति पहले ही असहनीय मानसिक पीड़ा में हो सकता है.....उसे निर्णय नहीं चाहिए....उसे करुणा चाहिए.....उसे सुरक्षा चाहिए....
उसे साथ चाहिए.....उसे उपचार चाहिए.....और सबसे बढ़कर - उसे यह विश्वास चाहिए कि अभी कहानी समाप्त नहीं हुई है।
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यदि अभी आपके मन में आत्महत्या का विचार आ रहा है तो यह हिस्सा ध्यान से पढ़ें-
प्रिय दोस्त , यदि आप यह लेख इसलिए पढ़ रहे हैं क्योंकि आपके मन में अभी आत्महत्या का विचार आ रहा है, तो मेरी आपसे केवल एक विनती है - आज कोई अंतिम निर्णय मत लीजिए.....आपको अभी अपनी पूरी जिंदगी का समाधान नहीं करना है.....आपको केवल आज को पार करना है......अभी किसी व्यक्ति को फोन कीजिए......उसे साफ-साफ बताइए - “मेरे मन में आत्महत्या के विचार आ रहे हैं, मुझे अकेला मत छोड़ना।”
दोस्त, यह वाक्य बोलना कमजोरी नहीं है। यह जीवन को बचाने की दिशा में पहला साहसिक कदम है। यदि संभव हो तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति के पास चले जाइए। अकेले कमरे में बंद मत रहिए। ऐसी चीजों और स्थानों से दूर हो जाइए जिनसे आप स्वयं को नुकसान पहुँचा सकते हैं। और किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से तुरंत संपर्क कीजिए।
भारत में Tele-MANAS की राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन 14416 तथा 1800-89-14416 उपलब्ध है। यदि तत्काल खतरा हो तो नजदीकी अस्पताल/आपातकालीन सेवा से तुरंत सहायता लें।
अपने मन से एक नया संवाद शुरू कीजिए l जब मन कहे - “सब खत्म हो गया।” तो स्वयं से पूछिए - “क्या सचमुच सब खत्म हुआ है या मैं अभी अत्यधिक पीड़ा में हूँ ?” जब मन कहे - “मेरे पास कोई रास्ता नहीं।” तो पूछिए - “क्या मैंने किसी दूसरे व्यक्ति से मदद माँगकर सारे विकल्प देखे हैं ?” जब मन कहे - “मैं असफल हूँ ।” तो कहिए - “मैं एक परिस्थिति में असफल हो सकता हूँ, लेकिन मैं स्वयं असफल नहीं हूँ।”
जब मन कहे - “सब लोग मेरे खिलाफ हैं।” तो कहिए - “अभी मुझे ऐसा महसूस हो रहा है; भावना और तथ्य हमेशा एक नहीं होते।” और जब मन कहे - “मुझे मर जाना चाहिए।” तो स्वयं से कहिए - “नहीं। मुझे मरना नहीं है। मुझे इस दर्द से बाहर निकलना है।” यह दोनों बातें एक नहीं हैं l
💧अपने जीवन को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटिए -
संकट के समय पूरी जिंदगी के बारे में मत सोचिए l केवल - अगला घंटा..... फिर - आज की रात..... फिर - कल की सुबह.....धीरे-धीरे मन की स्थिति बदल सकती है। चलना शुरू कीजिए.....सूर्य के प्रकाश में जाइए......किसी व्यक्ति से बात कीजिए......एक्सरसाइज कीजिए..... दीपक जलाये और बैठकर प्रार्थना कीजिए......ध्यान कीजिए.....अपनी भावनाएँ लिखिए..और यदि आवश्यकता हो तो तत्काल चिकित्सकीय सहायता लीजिए। इनमें से कोई एक चीज चमत्कार नहीं है। लेकिन कई छोटे सहारे मिलकर व्यक्ति को संकट से बाहर निकाल सकते हैं।
💧आध्यात्मिकता का सबसे सुंदर उपयोग -
हम अक्सर आध्यात्मिकता को केवल मंदिर, पूजा, मंत्र और ध्यान तक सीमित कर देते हैं। लेकिन शायद आध्यात्मिकता का सबसे सुंदर रूप यह है - जब कोई व्यक्ति टूट रहा हो और हम उसके पास बैठ जाएँ....जब कोई निराश हो और हम उसे आशा दें.....जब कोई स्वयं को बेकार समझ रहा हो और हम उसे उसकी कीमत याद दिलाएँ......जब कोई हार चुका हो और हम उससे कहें - “तुम्हारी हार तुम्हारी पहचान नहीं है।” यही करुणा है, यही सेवा है और शायद यही वास्तविक आध्यात्मिकता भी है।
💧 माता-पिता के लिए एक विशेष संदेश -
अपने बच्चों को केवल यह मत सिखाइए कि - “तुम्हें सफल होना है।” उन्हें यह भी सिखाइए - “तुम असफल हो सकते हो और फिर भी हमारे लिए उतने ही प्रिय रहोगे।” उन्हें यह विश्वास दीजिए कि - 99% नहीं आए तो भी घर है.....कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला तो भी घर है.....नौकरी चली गई तो भी घर है.....प्रेम संबंध टूट गया तो भी घर है......व्यवसाय में नुकसान हुआ तो भी घर है। क्योंकि जिस बच्चे को यह विश्वास होता है कि - “मेरी सफलता से अधिक मेरे माता-पिता को मेरा जीवन प्रिय है।” वह संकट के समय मदद माँगने की अधिक संभावना रखता है।
💧बच्चों से यह प्रश्न भी पूछिए -
“पढ़ाई कैसी चल रही है?” के साथ कभी-कभी पूछिए “तुम अंदर से कैसे हो?” “तुम खुश हो ?” “किस बात का सबसे ज्यादा दबाव है ?” “क्या कोई ऐसी बात है जो तुम हमसे कहना चाहते हो ?” और सबसे महत्वपूर्ण - जब बच्चा कुछ कहे तो तुरंत समाधान देने के बजाय पहले सुनिए.....कभी-कभी बच्चे को समाधान से पहले एक सुरक्षित श्रोता चाहिए।
💧समाज को भी बदलना होगा -
हमारी सामाजिक व्यवस्था में सफलता को बहुत अधिक महत्व मिला है - अच्छे अंक, अच्छी नौकरी, बड़ा व्यवसाय, बड़ा घर, महंगी कार, सामाजिक प्रतिष्ठा। लेकिन हमें यह भी सिखाना होगा कि - मनुष्य का मूल्य उसकी उपलब्धियों से बड़ा है। एक व्यक्ति नौकरी खो सकता है....व्यवसाय खो सकता है ...पैसा खो सकता है......प्रतिष्ठा खो सकता है......प्रेम खो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसने अपना मूल्य खो दिया।
💧और अंत में… जीवन से एक संवाद -
जब जीवन बहुत कठिन हो जाए, तो कुछ क्षण शांत बैठिए। आँखें बंद कीजिए और धीरे-धीरे सांस लीजिए।और अपने भीतर कहिए - “हे ईश्वर, मुझे अभी पूरी जिंदगी का रास्ता मत दिखाओ..... मुझे केवल अगला कदम दिखाई दे जाए......मुझे इस क्षण को पार करने की शक्ति दे.....मेरे मन का अंधेरा कम कर.....मेरे भीतर आशा का एक छोटा-सा दीप जला और मुझे ऐसे लोगों तक पहुँचा जो मेरी सहायता कर सकें।” ........फिर आँखें खोलिए और एक व्यक्ति को फोन कीजिए। क्योंकि कभी-कभी ईश्वर हमारी समस्या का समाधान किसी चमत्कार से नहीं - किसी इंसान के रूप में भेजता है।
💧जीवन की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है -
हो सकता है आज आपको अपने जीवन की दिशा दिखाई न दे, हो सकता है आप थक गए हों, हो सकता है आपको लगे कि आप हार चुके हैं। लेकिन याद रखिए - थक जाना और हार जाना एक बात नहीं है। रोना और कमजोर होना एक बात नहीं है। मदद माँगना और असफल होना एक बात नहीं है। एक अध्याय का दुखद होना पूरी किताब का दुखद होना नहीं है। और सबसे महत्वपूर्ण - “जिस क्षण आपको लगता है कि अब कोई रास्ता नहीं बचा, उसी क्षण किसी दूसरे व्यक्ति को अपने साथ उस अंधेरे में लेकर आइए।” क्योंकि हो सकता है आपको रास्ता दिखाई न दे.....लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति को दिखाई दे जाए और शायद यही कारण है कि मनुष्य को अकेला नहीं बनाया गया।
यदि इस लेख को पढ़ने वाला कोई व्यक्ति अभी आत्महत्या के विचार से जूझ रहा है, तो मेरी उससे कोई दार्शनिक बहस नहीं है। मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ - आज मत जाइए......आज कोई अंतिम निर्णय मत लीजिए..... किसी को फोन कीजिए....किसी के पास बैठिए.......मदद माँगिए......डॉक्टर से मिलिए......प्रार्थना कीजिए.....रो लीजिए। लेकिन अपने जीवन का अंतिम फैसला उस मनःस्थिति में मत कीजिए जो स्वयं संकट में है। आपकी वर्तमान पीड़ा वास्तविक है - लेकिन यह जरूरी नहीं कि आपका भविष्य भी ऐसा ही हो। और शायद….आपकी जिंदगी में अभी वह अध्याय आया ही नहीं है जिसके लिए पूरी कहानी लिखी जा रही है।
अंत मे दोस्तों, यदि यह लेख आपको उपयोगी लगा हो तो इसे केवल अपने तक सीमित न रखें.... किसी ऐसे व्यक्ति तक पहुँचाइए जो बाहर से सामान्य दिखाई देता है लेकिन भीतर से संघर्ष कर रहा हो। कभी-कभी एक संदेश, एक फोन कॉल, एक मुलाकात और कुछ मिनटों की संवेदनशील बातचीत किसी व्यक्ति को जीवन की ओर वापस मोड़ सकती है। जीवन को बचाना केवल डॉक्टरों या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है......यह हम सबकी जिम्मेदारी है।
— withrbansal





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